Tuesday, 7 August 2012

YATRA AMARNATH 2012 'BAM-BAM BHOLE '.

         दुर्गम  यात्रा,  दुर्लभ  दर्शन 
पहलगाम जाने वाले  रास्ते  पर 
 भूस्खलन के कारण फंसी   गाड़ियाँ  
2011  में हम लोगो ने , जिसमे काफी लोग शामिल थे ,अमरनाथ जाने की योजना बनायीं और उसी अनुसार टिकिट भी करा ली लेकिन जाने के कुछ दिन पहले ही किसी कारणवश टिकिट केंसिल करानी पड़ी। मन में दुःख तो बहुत हुआ लेकिन कुछ किया नहीं जा सकता था सिवाय एक वर्ष इंतजार करने के ।इस बार मई  (2012) में जैसे ही रजिस्ट्रेशन  करने का समय आया हमने किसी से भी पूछने की कोशिश नहीं की कि कौन जायेगा और कौन नहीं जायेगा। बस अपने ट्रेवेल एजेंट से बात की और अपना व् अपनी बेटी  शुभ्रा   का रजिस्ट्रेशन करने के लिए कह दिया और इधर अपनी व् अपनी बेटी की टिकिट 16 जुलाई 2012,  जम्मूतवी ट्रेन से बनाने के लिए दे दी।   किन्तु मन में एक संशय था की कोई आदमी साथ में होना चाहिए , पता नहीं कहा कौन सी परेशानी आ जाये ।वैसे तो हमारे ट्रेवेल एजेंट ने जिम्मेदारी ले ली थी ,फिरभी  हमने अपने छोटे भाई से बात की और पूछा की क्या वो  हमारे साथ अमरनाथ यात्रा पर जायेगा उसने भी सुनते ही हामी भर दी और अपना रजिस्ट्रेशन इटावा    से करवा लिया । इधर 'द  वेक ' हिंदी मासिक पत्रिका के ज्योतिषाचार्य टी पी तिवारी  जी ( पहले भी दो बार अमरनाथ की यात्रा कर चुके है) ने जब सुना कि  हम लोग अमरनाथ यात्रा पर जाने की तैयारी  में है तो उन्होंने तीसरी बार हम लोगो के साथ जाने का मन बना लिया । उनकी तैयारी  ने हम लोगो में उत्साह भर दिया क्योंकिं वे हम लोगो के लिए एक अच्छे गाईड    सिद्ध होने वाले थे । हमारी तैयारी   अपनी रफ़्तार से चल रही थी इधर हमारे श्रीमान मनोज त्रिवेदी जी ने सोचा की जब जाने का समय आएगा तब वे अपनी  टिकिट वी आई पी से करवा कर हम लोगो के साथ चले जायेंगे लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था                                
  एक  सुनसान होटल में चाय  बनाते  सहयोगी 
 रामबन  के  पास  चिनाव   नदी   के  किनारे
 जाम    के दौरान  का  एक दृश्य  
ऍन वक्त पर उनके मेनेजर की माता जी का स्वर्गवास हो गया जिस कारण उनका जाना स्थगित हो गया । आरम्भ में सबको लगा की शायद हम अपनी टिकिट कैंसल करा ले लेकिन जब हमारे निर्णय की गंभीरता देखी तो सबने हथियार डाल दिए
और इस तरह हम एक दुर्गम यात्रा की तरफ बढ़ निकले । इस ट्रिप में तीस लोग थे कुछ स्लीपर में तो कुछ ए सी थ्री में तो कुछ एसी टू में। ट्रेन ने जब स्टेशन छोड़ा तब हमने अपने केबिन में देखा की कौन लोग हमारे सहयात्री है क्योंकि उससे पहले हम साथ जाने वाले लोगो के साथ स्टेशन पर ही व्यस्त थे । सहयात्रियों से बातचीत के दौरान पता चला की वे सभी जम्मू कश्मीर की यात्रा पर है । उनमे से एक दो को छोड़कर बाकि के सारे लोग श्री अमरनाथ की यात्रा पर जाने वाले है । मन को बड़ा सुकून मिला की हम अकेले नहीं है इस जोखिम भरी यात्रा के राहगीर ।ट्रेवेल एजेंट का इंतजाम काफी अच्छा था ,खाने पीने की कोई तकलीफ नहीं हुयी । सहयात्री भी सही थे इसलिए सफ़र आसानी से कट गया । ट्रेन निश्चित समय से चार घंटे लेट जम्मू पहुंची हम लोग साढ़े बारह बजे जम्मू स्टेशन पर उतरे । वहा की गर्मी की प्रचंडता ने दिमाग ख़राब कर दिया ।हम लोग जो  दस  महीने कोलकाता की गर्मी को कोसते है सोचने पर मजबूर हो गए की जम्मू कितना गरम है ।  ट्रेन लेट नहीं होती तो   पूरा   दिन हम   जम्मू में  गुजारते   और पूरा जम्मू आराम से घूम लेते किन्तु देर से पहुचने  के कारण खाना खाते                  
                                                                                         पीते    दिन का दो बज  गया । बाहर गर्मी                  
                                                                                          अपने पू रे यौवन पर थी । हम लोगो की हिम्मत नहीं हुयी की हम लोग बाहर जाकर घूम सके । दिन के साढ़े  चार बजे हम लोग होटल से  बाहर आये और ऑटो कर के घुमने  निकले ।  ऑटो वाले ने साढ़े तीन सौ रूपये प्रत्येक ऑटो के अनुसार लिए । इस  तरह तीन ऑटो में   सवार होकर हम लोगो ने जम्मू घूमा । लेकिन जम्मू घूमने में मजा नहीं आ  रहा था । आँखों के सामने अमरनाथ और कश्मीर की सुन्दरता नाच रही थी । एक ऐसी दुनियां जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी ।   कश्मीर की खबरे और प्राकृतिक सुन्दरता सिर्फ अखबारों तक ही सीमित रहती । कश्मीर का नाम आते ही वंहा के दंगे -फसाद आतंकवादी ,अलगाववादी सभी डराने लगते और कश्मीर जाने की योजना कल्पना मात्र बनकर रह जाती । श्री अमरनाथ यात्रा के समय वंहा सुरक्षा का अतिरिक्त बंदोबस्त होता है.अतः  तीर्थ यात्री या पर्यटक सभी सुरक्षित रहते है ।  इतनी सुरक्षा के   बाद भी आतंकवादी अपने मंसूबो को पूरा करने में कामयाब हो जाते है । एक दिन जम्मू में रूककर हम लोग दुसरे दिन  सुबह साढ़े पञ्च बजे तीन टेम्पो travelor   में सभी बैठ कर पहलगाम के लिए रवाना हो गए । अभी कुछ ही दूर गए थे की एक पुलिस वाले ने गाड़ी रोक दी और बाइपास से जाने को  कहा । जब बाइपास पहुंचे ( उधमपुर से पाँच किलोमीटर पहले ) तो वंहा काफी  जाम  लगा था । पता चला की रामबन के पास भुस्खंलन ( लैंड -स्लाइड ) हुआ है इसी कारण यात्रा बाधित हो रही है । सर पर चढ़ता हुआ सूरज और दूर -दूर तक आबादी का कोई  नामो - निशान नजर नहीं आ रहा था नजर आ रही थी तो सिर्फ ट्राफिक पुलिस और  जाम में  लोग । थोड़ी देर इधर -उधर भटकने के बाद पता चला की दो किलोमीटर की दूरी पर एक होटल है । ये सुनना था की हम नौ लोगो की टीम जो एक टेम्पो traveler में   बैठी हुयी थी होटल की दिशा में पैदल ही चल दी । वंहा पहुचे तो देखा की राजकुमार घोष जो की हमारे साथ ही इस यात्रा में शामिल थे हमलोगों से पहले पहुँच कर उस सूनसान होटल में मैगी बना रहे है. । हम लोगो ने उन्हें चिढाते हुए कहा की आपने इस होटल का चार्ज कब से सम्हाल लिया है । उन्होंने भी हँसते हुए जवाब दिया की इस होटल वाले को मैगी बनाना नहीं आता अतः हम आप लोगो के लिए मैगी बना रहे है । उन्होंने बड़े प्रेम से हम लोगो को मैगी बना कर खिलाई और साथ में बढ़िया सी चाय बना कर दी। हंसी -मजाक के दौरान तीन चार घंटे आसानी से कट गए । जैसे ही खबर मिली की दूसरा रास्ता जो शहर से होकर जाता है खुल गया है ।हम सभी आनन-फानन  अपनी गाड़ियों में बैठ गए । जैसे ही गाड़ी कुछ आगे बढीं की रस्ते में तैनात पुलिस ट्राफिक ने फिर से रोकने की कोशिश की तो उससे बहाना बना दिया की हम लोग उधमपुर स्टेशन ट्रेन पकड़ने के लिए जा रहे है ।हम लोगो का बहाना  काम कर गया किन्तु जैसे - जैसे आगे बढ़ रहे थे वैसे ही जाम में फंस रहे थे । गाड़ी चलने की जगह    रेंग रही थी । रात गहराने के साथ ही पहलगाम देखने की  उत्सुकता मन में दफ़न होने लगी क्योकिं योजना के मुताबिक बीस जुलाई को ही  हम लोगो को शेषनाग झील के लिए रवाना होना था  मेरी उदासी देखकर टी पी तीवारी सर ने समझाते हुए कहा की पहलगाम का बहुत बड़ा हिस्सा हम लोग चन्दन बड़ी जाते समय देख लेंगे । 
   चिनाव  नदी के  किनारे 

A view of Chenav river 

पहलगाम  में ,होटल आईलेंड  के   बाहर 

 पहलगाम 
Road of Pahalgam , full of scenic beauty 

 पहलगाम में लिद्दर  नदी
 Beautiful view of Pahalgam Garden 

 चन्दन   बाडी  से  पिस्सू  टॉप   की  ओर जाते तीर्थयात्री 

 लिद्दर  नदी के ऊपर जमी हुयी बरफ   




  Lidder river goes along  on the way of Pissu top 

Langar in Pissu top 

Descending from the horse at Pissu top 

Resting in a langar of Pissu top 

It's very hard to track.

being exhausted  unable to climb.

A wooden old  narrow bridge ,which everyone has to cross on foot.
horses are not allowed, It's very risky.

In a camp of Sheshnag Jheel 

At the gate of Sheshnag jheel's camp.

Mahagunas Parvat. 



















अभी तो काफी चलना है ।

पहाड़ों के बीच से गुजरती लिद्दर नदी 

शेषनाग झील के पास 

 शेषनाग  झील 

पंचतारनी  के रास्ते पर श्रद्धालु 

महागुनस  पर्वत , समुद्रतल से  14900 फीट की  ऊंचाई पर 
( गणेश पर्वत, यहाँ शिव जी ने गणेश भगवन को छोड़ा था ) 

 अचानक बर्फ टूटने  से  पानी में फंसे दो घोड़े,  
जिन्हें निकालने की कोशिश करते लोग । 
 पंच्तारनी  में   भंडारा 

Near the bank of Panchtarani river.
Which called Sangam
 

A photo session with BSF soldiers & journalist of Panjab. 




Flags of India at the height of  2000 km.




along with army officers.

Resting in Military Camp.

Very narrow way   from
Panchtarni to Shri Amarnath Holy cave 

Too tired to walk. 

A moment of  heavy relief . At Baltal Camp. 





















Saturday, 9 June 2012

आवश्यकता है चुनौती स्वीकारने की


हम न्यू मार्केट में सुन्दर सजाने लायक आकर्षक वास्तु खोज रहे थे किन्तु परेशानी ये थी की चारो तरफ अत्यंत आकर्षक वस्तुओं से सजा मार्केट हमें भ्रमित कर रहा था की हम ले तो क्या ले । आकर्षक गणेश की मूर्ति हो या राधाकृष्ण या कोई अन्य शोपीस ,जिधर भी निगाह जाती वही  टिकी रह जाती ।हर वस्तु अपने आप में अनमोल ,अनूठी लग रही थी ,दाम भी कुछ खास नहीं थे । हमें आश्चर्य हो रहा था की चीन ने न्यूनतम दाम से लेकर अधिक दाम तक कितनी खुबसूरत वस्तुओं का निर्माण कर डाला । चाहे वो सस्ते दाम के मोबाइल हो या डेढ़ सौ रूपये में बिकने वाले फेंसी बैग । 75 -125 में घडी ,फूलदान हो 45 रूपये में  बच्चों के लिए आकर्षक खिलोने पानी की बोतल, कलर पेन्सिल ,चूड़ी और न जाने क्या -क्या । यहाँ तक कि  हिन्दू देवी -देवताओं की मूर्तियाँ तक इतनी सजीव बनायीं की कोई भी उन्हें खरीदने के लोभ को संवरण नहीं कर पायेगा । चीन की कारीगरी और सस्ते में मॉल मुहैया  कराने  की चेष्टा ने मन मोह लिया किन्तु साथ ही एक सवाल खड़ा कर दिया ,क्या चीन भारतीय लघु उद्योग को ख़त्म कर रहा है ,क्या चीन की भारतीय बाजार पर पकड़ भारत की आर्थिक व्यवस्था पर चोट है। अगर चोट है तो हम कर क्या रहे है। क्या हम 1962 के युद्ध को भूल गए वो भी तब जब भारतीय हिंदी -चीनी भाई -भाई का सुर अलाप रहे थे और चीन भारत की भूमि पर काबिज हो रहा था ।आज भी हम चीन की नियत को समझ नहीं प् रहे है की वो भारत को बर्बाद करने की कोशिश कर रहा है । भारत को चारो तरफ से घेरने की उसकी मंशा को हम जानबूझकर अनदेखा कर रहे है । आज भी चीन को हम भारतीय अपना हितैषी समझे हुए है ,और यही वजह है की दिन -प्रतिदिन चीन के मॉल को भारत के बाजार में उतरना और चीन की आर्थिक स्थिति को मजबूत करना चीन के प्रति हमदर्दी ही है । अगर चीन के प्रति हमदर्दी नहीं होती तो हम स्वदेशी जागरण की भावना को  दरकिनार कैसे कर सकते है । उस स्वदेशी जागरण की भावना को जिसने भारत की आजादी में अहम् भूमिका निभाई थी ।कैसे भूल सकते है हम गाँधी जी के चरखे को । विदेशी कपड़ो को जलाकर खाक में मिलाने के सशक्त कदम को । वो भी तो सुन्दर थे किन्तु स्वदेशी जागरण की भावना के आगे उनकी सुन्दरता देशभक्तों को बांध नहीं पाई । जो गौरव और संतुष्टि स्वयम निर्मित वस्त्र पहनने से मिली उसके आगे ब्रिटिश के आधुनिक कपडे भी फीके पड़  गए ।आज फिर से प्रत्येक भारतीय के सामने चुनौती है अपने देश की आर्थिक स्थिति  सुधारने  की जिसे हम अपने देश में निर्मित वस्तुओ को खरीद कर सुधार सकते है  और लघु उद्दमियों को व्यवसाय से सम्बंधित चुनौतियों को स्वीकारने की ,चाहे वो नयी तकनीक वाली मशीने खरीद कर चीन से बेहतर सामान बाजार में उतारने की हो या चीन की जमीं पर जाकर उसके बाजार में अपनी पकड़ बनाने की हो । जैसे भी हो अगर चीन को  करारा  जवाब देना  है तो उसे उसी के तरीके से देना होगा अन्यथा उसके सामान को अपने बाजार में वरीयता देने का मतलब भारत के साथ  धोखा है जिसे   हमारे देश के अनेक कर्णधार और  उपभोक्ता जाने -अनजाने में अनदेखा कर रहे है । 

Saturday, 5 May 2012

Iskcon Temple ,Mayapur (West Bengal)

 इस्कान टेम्पल ,  मायापुर ,पश्चिम बंगाल .


मायापुर जाने की बहुत दिनों से इच्छा थी किन्तु जाना नहीं हो पा रहा  था ।कितनी बार हुआ की हम लोग कृष्णानगर तक गए लेकिन मायापुर नहीं पहुंचे । इस बार जैसे ही   कृष्णानगर जाने का काम  हाथ में आया  हम ख़ुशी से फुले नहीं समाये हमने तुरन्त योजना   मायापुर  में ठहरने  की  बना ली                अपने पतिदेव को भी समझा दिया,  इस निवेदन के साथ की भोजन के लिए एक दिन होटल की शरण  में चले जाना । क्योंकि हम आज जाकर वापस नहीं आयेंगे बल्कि दुसरे दिन शाम तक आ जायेंगे   दिन में काम करेंगे और रात में मायापुर जाकर ठहरेंगे दुसरे दिन घूमने  के बाद सियालदह की लोकल पकड़ कर कोलकता वापस आ जायेंगे । हम सभी अपनी योजना के अनुसार निकल गए लेकिन दिन भर कम में व्यस्त रहने के कारण हम सभी शाम के सात बजे मायापुर पहुचें 


'घूमते रहना कोई तदबीर नहीं 
एक चक्कर है मेरे पाँव  में जंजीर नहीं' ग़ालिब 



मायापुर में स्थित इस्कान टेम्पल 

अंग्रेज महिला हरे कृष्ण ,हरे कृष्ण का गायन करवाती  हुयी 

वर्षो से यहाँ अनवरत हरे  कृष्ण का जप चल रहा है .

चन्दन उत्सव की  तयारी करती महिलाएं 
इस्कान टेम्पल के संस्थापक आचार्य प्रभुपाद 

मायापुर के इस्कान टेम्पल में   झांकी 
प्रभुपाद के निर्वाण के समय की झांकी अपने भक्तो के उपदेश देते हुए 

इस्कान टेम्पल के प्रांगन में साडी  में सजी विदेशी महिलाएं 

इस्कान टेम्पल के प्रांगन का दृश्य 

भूख से बिलखती गर्भवती बिल्ली 

प्रसाद का लड्डू और बिस्कुट खाती हुयी 
गोशाला का मुख्य द्वार 
गायों को सहलाते हुए 


Saturday, 28 April 2012

Bengal's traditional Tant Sarees.

                                                          तांत  साड़ी


तांत  साडी  में इस्तेमाल होने वाला सफ़ेद धागा.
 
पश्चिम बंगाल की शान ,पहचान समझी जाने वाली तांत साड़ी देखने में जितनी सुन्दर ,पहनने में  उतनी ही आसान होती है.बंगाली  बाड़ी  में कोई भी त्यौहार हो या पर्व  वो तब तक अधूरा है जब तक उस परिवार से जुडी हुयी महिलाये तांत साड़ी न पहने . बंगाली  परम्परा  के अनुसार पहनी हुयी तांत साड़ी में सजी हुयी महिलाये दिखने में बहुत ही  सुन्दर लगाती है.किन्तु बंगाल के मध्यम व् निम्न वर्ग की अधिकतर महिलाये सूती साड़ी ही पहनती है । यही नहीं तांत साड़ी उद्योग एक लघु उद्योग है इससे जुड़े लोग साड़ी कैसे बनाते है उनकी क्या आमदनी है वे कितने घंटे काम करते है.इन कारणों के बारे में विस्तृत जानकारी  प्राप्त करने के लिए 'द वेक' टीम ने उन जगहों 'शांतिपुर ,फुलिया,रानाघाट 'आदि का भ्रमण किया जंहा तांत साड़ी बनती है |' द वेक' टीम  तांत साडी की खोज खबर लेने के लिए १९ अप्रेल २०१२ को घर से निकली तो सबसे पहला झटका लगा ये जानकर की आज    टैक्सी  हड़ताल है.घडी देखी तो सुबह के सात बज चुके थे जबकि साढ़े सात बजे हमें सियालदह स्टेशन पर पहुचना था . हम लोग तुरंत सियालदह जाने वाली बस पकड़ने के लिए पैदल निकल पड़े .चांदनी से हम लोगो को बस मिल गयी .बैठने के बाद ख्याल आया की राजेश (समाचार संपादक ) का आफिस 'विश्वामित्र हिंदी दैनिक " रास्ते में  पड़ता है उसको फोन करके बोल दे की वो आफिस से निकल कर सामने सड़क पर आ जाये  जिससे वो भी हम लोगो के साथ निकल जायेगा .अन्यथा उसे फिर स्टेशन अकेले पहुचना पड़ेगा .हमने उसे फोन किया लेकिन जनाब को फोन उठाना ही नहीं था .हमारे साथ सुजीत ,शुभ्रा अदि ने भी फोन किया लेकिन नतीजा वही का  वही .हमने अपने सहयोगी दल  से कहा की  परेशान  होने की बात नहीं है वो खुद ही स्टेशन पहुँच जायेगा.  जैसे ही हम लोग सियालदह स्टेशन पर पहुंचे तो सामने ही  लालगोला  लोकल ट्रेन जाने के लिए तैयार खडी   देखी. किन्तु हम लोग उसमे चढ़ नहीं सकते थे  वजह राजेश का न पहुचना .हमें क्रोध तो बहुत आया की जब पहले से ये निश्चित हो गया था की हम लोग सुबह साढ़े सात बजे सियालदह पर मिलेंगे तो वो पहुंचा क्यों नहीं.हमने अपने साथ के लोगो से कहा की चिंता की कोई बात नहीं अगर राजेश नहीं आयेगा तो हम चारो लोग उसको लिए बिना ही निकल जायेंगे .इस पर सुजीत बोला  "हम लोग दस मिनट और  इंतजार कर लेते है ।" आठ बजे देखा जनाब अपना बैग लटकाए हुए आराम से चले आ रहे है.पूछने पर पता चला की जनाब सोकर ही सात बजे उठे .पूछने पर अपनी सफाई देते हुआ कहा की "अगर फोन उठाता तो तैयार कैसे होता" बस फिर क्या था इस यात्रा का शुभारम्भ  उसको हड्काने के साथ हो गया. क्योकि उसकी वजह से हम लोगो को नौ बजे की ट्रेन पकडनी पड़ी .सियालदह से रानाघाट का रास्ता लोकल ट्रेन से  मात्र दो घंटे का है.और किराया  सिर्फ  पंद्रह  रुपये. ट्रेन ठीक ग्यारह बजे पहुँच गयी .  सबसे पहले  रानाघाट जाने का एक कारण ये भी था की वहा पर हमारे कुछ लोग हमें साड़ी वालो से मिलवाने वाले थे वहा से हमें शांतिपुर और फुलिया जाना था.भयंकर गर्मी पड़ रही थी ऊपर से उसी कड़क धुप में सबको पैदल घूमना पड़ रहा था   .कुछ लोगों ने रुमाल भिगोकर सर पर रख लिया तो कुछ ने छाता ले लिया . हम सभी उस छोटे से रानाघाट की गलियों और रास्तो को नाप रहे थे .जगह  -जगह छोटे -छोटे कारखाने थे कही दस मशीनों वाले तो कही चार .उनमें काम करने वाले १२ से १४  (12-14 hrs) घंटे  काम करते है.जिसमे से दो घंटे खाना खाने के लिए होते है.इन कारखानों में  काम करने वाले को एक  साड़ी पर लगभग ३५ से ४०  ( 35  -40  )रूपये मिलते है.जिस मजदुर को ३५ रूपये मिलते है वो डबी नामक मशीन पर काम करता है. एक आदमी एक दिन में आठ से दस साड़ी बना लेता है. एक साड़ी तैयार होने में दो से ढाई घंटे का समय लगता है.इस तरह से इन कारखानों में काम करने वाले को एक दिन में अच्छा पैसा मिल जाता है.
डबी मशीन से बनने  वाली  साड़ी में सिर्फ बार्डर  पर ही काम होता है. 
बी मशीन में जो भाग डिजायन बनाने के लिए काम में आता है वो लकड़ी का  बना  होता  है.जबकि जैकेट मशीन (Jacquard Mchine) में डिजायन वाला भाग लोहे का होता है. डबी  मशीन से जो साड़ियाँ बनती है उन साड़ियों के बार्डर पर ही काम होता है.दूसरी मशीन जिसे  जैकेट  कहा जाता  है ,इस मशीन की डिजायन लोहे की बनी होती है.इससे बनने वाली साड़ी पर पूरा भरा हुआ काम होता है ,जैसे की आंचल के साथ -साथ पूरी साड़ी में छोटी -छोटी बूटियां. इस लिए इस मशीन पर काम करने वाले मजदुर को एक दिन का ४० से ४५ मिलता है. यंहा भी  एक आदमी ,एक दिन में आठ से लेकर दस साड़ी तक बना लेता है .अगर बिजली की कटौती नहीं हुयी तो अन्यथा चार साड़ी बनाना भी मुश्किल हो जाता है.यही कारण है की इन मशीनों को पावर लूम  कहा जाता है. इन मशीनों पर तैयार होने वाली साड़ियों को थोक भाव के अनुसार तीन सौ से लेकर चार सौ तक में बेंचा जाता है जिनका दाम बाजार में जाने के बाद पाँच सौ से लेकर छः सौ तक हो जाता है.
तांत की  सफ़ेद  साडी ,लाल पाड़ के साथ 
ये   साड़ियाँ अधिकतर पूजा में चढाने के लिए उपयोग में ली जाती है.

तांत  साडी  में इस्तेमाल होने वाले रंगीन धागे.

 तांत  साडी  मिल में  काम करती हुयी महिला 
छोटे -छोटे कारखानों में तांत  साडी का काम .
इन मशीनों  को जैकेट ( जैकार्ड ) कहा जाता है  
ये पूरी साड़ी पर विभिन्न प्रकार की सुन्दर डिजायन बनाते है.
                                         

गमछा बनाता हुआ कारीगर 
जो लोग हैंडलूम पर काम करते है ,उन्हें पावर लूम की अपेक्षा जायदा मेहनत पड़ती है, उनके  हाँथ - पांव लगातार चलते रहते है .वे एक दिन में गमछे के चार थान बड़ी मुश्किल से बना पाते है. एक थान में चार गमछे होते है और इस थान की कीमत थोक भाव वाला ग्राहक मात्र ३५ रूपये देता है जबकि खुदरा बाजार में जाकर एक गमछे की कीमत ही ६५ से ७० रूपये तक हो जाती है.
बंगाल में तांत का काम अनेक जगहों पर होता है लेकिन इसके बावजूद भी  निम्न माध्यम वर्ग और निम्न वर्ग की अधिकतर महिलाये  सूती साड़ी पहनती है .इसकी मुख्य वजह तांत साड़ी का महंगा होना .इसके आलावा तांत साड़ी की देख-रेख ज्यादा करनी होती है .उसे बार-बार या तो लौंड्री में धोने व पोलिश के लिए भेजा जाये या फिर घर पर ही  कलफ लगाया  जाये .इनका कपडा भी ज्यादा दिन तक नहीं चलता .एक बार  भी घर में धो दिया जाये तो उसकी शकल बदल जाती है.यही वजह है की बंगाल में अधिकतर महिलाये  सूती साड़ी ही पहनना पसंद करती है.क्योकि सूती साड़ियों का रंग नहीं निकलता.और वे आसानी से घर में धोयी जा सकती है.
सूते का काम करती हुयी महिला 
एक गाँव में तांत की  साड़ी के बारे में जानकारी एकत्र करती हुयी
 वेक' की संपादिका एवम  पत्रकार शुभ्रा
शांतिपुर और फुलिया में अधिक दाम वाली बहुत सुन्दर साड़ियाँ बनती है इनमे तसर सिल्क ,जामदानी ,तान्गयल,काथा  के काम की हुयी  मुख्य  साड़ियाँ   है .जिन्हें शादी या किसी खास पर्व के अवसर पर पहना जाता है.
तांत साडी  का इतिहास 
लगभग पंद्रहवी शताब्दी(भक्तिकाल एवम वैष्णवी )के समय से ही शांतिपुर अपने कुशल साडी बुनकरों के चलते काफी चर्चा में रहा है .इनकी बनायीं नीलाम्बरी साडी घर -घर व्याख्यात थी, कहते है की उस समय के बुनकरों में अपनी कला के  प्रति जबरदस्त लगाव था,जिसके चलते वे हर समय कुछ न कुछ नया करते रहते थे यही नहीं इन्होने  उन्नीसवी शताब्दी (19th century) में अंग्रेजो की नीतियों के प्रति अपना रोष भी दर्ज करवाया है और विरोध भी .समय के साथ -साथ 1920 में बैरेल डोबी   (Barrel Dobby) नमक मशीन आई जिसने तांत साडी जगत में क्रन्तिकारी कदम रखा   1930 में (Jacquard Machine,  ग्रामीण भाषा में जैकेट कहा जाता है ) जैकार्ड मशीन का  आगमन हुआ .इस तरह से तांत उद्योग ने  आश्चर्य जनक सफलता प्राप्त की. 
 बटवारे  के बाद एक जबरदस्त बदलाव आया बहुत  सारे   बुनकर पाकिस्तान चले गए जो बर्तमान में बंग्लादेश है | धाकाई जामदानी साडी (Dhakai Jamdani) जो तांत की बेहतरीन साड़ियों में से मानी जाती है उसके बुनकर ढाका  के पास एक जगह में   बसे हुए है । जो बुनकर पश्चिम बंगाल के नदिया ,बर्धमान ,फुलिया,शांतिपुर  में  बसे हुए है  . उन  लोगो ने फुलिया तन्गयल (Fulia Tangail) नाम से साडी निकाली .शांतिपुर और फुलिया  के बुनकरों ने अपने कौशल का परिचय देते हुए एक और  नयी डिजायन की तांत साडी निकाली जिसे दोनों तरफ से पहना जा सकता है .
सहयोगी दल  

Sunday, 25 March 2012

Illegal immigration in Assam .


निजी स्वार्थ की उपज है  बंगलादेशी  घुसपैठ 
प्रकति की गोद में समाया असम  अदभुत सुन्दरता को अपने आगोश में लिए हुए प्रत्येक सैलानी को अपनी ओर आकर्षित करता है. ऊँची -ऊँची चोटिया,गहरी खाइयाँ ,ब्रह्मपुत्र की गर्जना ,ब्रह्मपुत्र के बीचो -बीच बने हुए माजुली व् भीमाशंकर टापू .अपने में रहस्यों को समेटे कामख्या सिद्धपीठ ,बगुलामुखी व् भुवनेश्वरी देवियों के मंदिर,नीरव सोंदर्य से भरपूर वशिष्ठ आश्रम ,काजीरंगा व् मानस century  जंहाँ  हाथियों के ऊपर बैठ कर दुर्लभ सुन्दर पक्षियों का कलरव सुनना ,गुम होती हुयी प्रजातियों के दर्शन करना तथा उन सभी  जानवरों को  देखने का सुखद अहसास मंत्रमुग्ध कर देता है जिन्हें हम या तो चिड़ियाघर में देखते है या फिर किताबो और discovery चैनल पर. | यंहा के निवासी भोले भाले व् कृष्ण भक्त है .क्यों न हो आखिर कृष्ण की पटरानी रुकमनी इसी असम प्रदेश की थी .जिसका उल्लेख भगवत गीता में मिलता है .तब असम को असम न कहकर कामरूप कहा जाता था इसी कामरूप के युवराज रुक्मण को हराकर कृष्ण ने रुकमनी को वरन किया था .इतना खुबसूरत असम प्रदेश जो विभिन्न प्रकार के खनिजो से भरपूर है उसे देखने के लिए  किसका मन लालायित नहीं होगा .किन्तु अगर किसी को वंहा जाने का अवसर मिलता है तो उसे ख़ुशी कम निराशा  ज्यादा  होगी . टूटी -फूटी सड़के ,जिन पर बड़े- बड़े  गड्ढे ,गंदगी ,विकास के नाम पर बंगलादेशी घुसपैठियों की बढती संख्या ,असम को स्वतन्त्र प्रदेश घोषित करने के लिए उल्फा , ऍन .ड़ी.एफ बी जैसे विभिन्न संगठनो की मांगे ,आये दिन इन संगठनो द्वारा बंद का आह्वान ,सुनवाई न होने पर बमबाजी ,हिंसा आदि असम की दिनचर्या में शामिल है .असम जैसे खुबसूरत प्रदेश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य  ये है कि केंद्र सरकार ने उसे कभी अहमियत दी ही  नहीं . विभिन्न पार्टियों के  नेताओ  ने अपनी सुविधा के अनुसार उसे बोली और शैली के अनुरूप टुकडो में बाँट दिया .अपने वोट बैंक को मजबूती प्रदान करने केलिए बंगलादेशियो को थोक के हिसाब से बसा लिया .बहुत से व्यवसायियों ने बंगलादेशी व् भूटानी लोगो को कम पैसे पर अपने कारखानों में काम पर रख लिया .बंगलादेशियो ने भी एक से रंगरूप का फायदा उठाते हुए स्थानीय लोगो कि जमीन पर दखल कर  पूरे  के  पूरे  गाँव अपने कब्जे में कर लिए .उदाहरण के लिए धुबरी ,और गोलपाड़ा जंहा स्थानीय लोगो कि संख्या न के बराबर है .बारपेटा,नलबारी ,नागो,और दारांग भी इसी दिशा में जा रहे है .इसका मुख्य कारण वंहा के सत्ताधारियो के लिए घुसपैठिये समस्या नहीं वरन उनका  वोट बैंक है ,वो वोट बैंक जो उनसे उन्ही कि जमीन छीन रहा है .लेकिन सत्ताधारी इस मद में फूले नहीं समां रहे है कि हम सत्ता में जनता कि पसंद से आये है.और आगे भी चुन कर आते रहेंगे .वे न ये देखना चाहते है न जानना कि जिस घुसपैठिये रूपी नाग को वो संरक्षण दे रहे है वो आने वाले दिन में उन्हें ही निगल जायेगा .अगर समय रहते नहीं चेते तो जिस असम पर वो राज कर रहे है ,नाज कर रहे है कल को वो ग्रेटर बंगलादेश का हिस्सा हो जायेगा.

Monday, 19 March 2012

Naked dance for food.

  और कितना गिर सकते है.
अंडमान निकोबार भारत का  वो हिस्सा है जिसे ब्रिटिश काल में काला पानी की सजा के लिए याद किया जाता था और आज  भी सेलुलर जेल  और क्रन्तिकारी वीर सावरकर के लिए जाना जाता है . अचानक ब्रिटिश  समाचार पत्र    ११ , जनवरी २०१२,  ओब्सर्वर में  छपी    खबर 'नेकेड डांस फार फ़ूड ' ह्यूमन सफारी और 'ह्युमन जू 'ने फिर से अंडमान निकोबार को चर्चा में ला दिया है . इस बार चर्चा का विषय था जरावा आदिवासी, जो भारत की प्राचीन सभ्यता का अनन्य अंग है और इस अनन्य अंग का तमाशा बना दिया कुछ स्वार्थी ,धन लोभी तत्वों ने .जरावा आदिवासी जो अपने को ग्रामीण व् शहरी सभ्यता  से दूर रखते   थे , अचानक उनके जीवन में परिवर्तन आया और उस परिवर्तन का कारण बना  उनके क्षेत्र   से गुजरने वाला हाईवे .जरावस अपने घने जंगलो से निकल कर  सड़क पर गुजरने वाले वाहनों को रोककर खाने की वस्तु या तमाखू मांगते   ,( जरावस का खाना सुअर ,नारियल ,शहद ,केला आदि ) जबकि उस क्षेत्र में जाना कानूनन जुर्म है   ,परन्तु  जंहा लालच है वहा कानून मायने नहीं रखता . नतीजा   उनके बाहर आने  का क्रम बढ़ना शुरू हुआ जो वहा से गुजरने वालो के लिए किसी   अजूबे से कम नहीं लगता था .बस वही से आरम्भ होगया उनके  नग्न  और अर्धनग्न नृत्य को देखने वाले पर्यटकों के आवागमन का .उस रास्ते पर तैनात सुरक्षाकर्मी या उस क्षेत्र के पुलिस कर्मी जो पर्यटकों से भारी रकम लेकर जारवास के भोलेपन का फायदा उठाते और आगे भी उठाते रहते अगर ब्रिटिश पेपर  आब्सर्वर और गार्जियन भारत सरकार को सूचित न करते और अपनी सुचना के साथ ही इन आदिवासियों के नग्न-अर्धनग्न  वीडियो क्लिप नेट पर डालकर अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारत की बदनामी न करवाते तो शायद सोती हुयी सरकार और समाज को पता ही नहीं चलता की हमारे बीच कुछ धनलोभी आदिवासियों की अज्ञानता का फायदा उठा रहे है .ये हम भारतीयों के लिए  शर्म की बात है की लन्दन में स्थित संस्था 'सर्वाइवल' आदिवासियों के हितो की रक्षा के लिए कार्य करती है .उनको शोषण से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाती है और अपील करती है की जरावा जाने वाले रस्ते को बंद किया जाना चाहिए ,साथ ही उनकी जमीन को बाहरी लोगो के अधिग्रहण से बचाना  चाहिए .उनकी अपील पर ध्यान देते हुए सर्वोच्च कोर्ट ने २००२ में अपने फैसले को सुनाते हुए उस रस्ते को बंद करने के लिए कहा .किन्तु कुछ  धन -लोलुप  लोगो ने इसे हवा में उड़ाते हुए जरावस की अज्ञानता ,नग्नता और भुखमरी को कमाई का जरिया बना लिया .खाने का सामान देने के बहाने उनके करीब जाना और उन्हें इसी अवस्था में नचवाना उन्हें इतना रस आया की इसके लिए क्या देशी क्या विदेशी जो भी मोटी रकम  थमाता  उसे उनके बीच पंहुचा देते बिना ये सोचे की वे जो कर रहे है उससे उनके देश की गरिमा को कितनी ठेस पहुंचेगीं . अफ़सोस इस पर   आलोचना करना तो दूर देश के ठेकेदारों ने इस पर चर्चा करना भी उचित नहीं समझा .मीडिया ने भी आया राम ,गया राम की तर्ज पर इससे मुंह मोड़ लिया .क्योकिं इन आदिवासियों के पास न तो देने के लिए पैसा है और न ही इनका वोट.जबकि आज की इस तेज रफ़्तार वाले समय में एक हाथ लेना और एक हाथ देने का चलन है.फिर हम कैसे उम्मीद कर सकते है की हमारे नेता ,अफसर ,या समाजसुधारक इनके विषय में सोचेंगे .सोचा है तो सिर्फ और सिर्फ कोर्ट ने जिसने   इनके जिस्म की नुमाइश को सख्ती से रोका है. 

Sunday, 26 February 2012

मम्मा मै जा नहीं रही हूँ ,

मम्मा मै जा नहीं रही हूँ , 
मेरी भांजी की विदाई का समय था  ,हम सभी अपनी भावनाओ को नियंत्रण करने में खुद को असमर्थ पा रहे थे .वही वो चट्टान की तरह से मजबूत खड़ी मुस्करा रही थी .उसकी माँ बेटी की विदाई को होता देख फफक -फफक कर रोने लगी .बेटी ने अपनी माँ को सम्हालते हुए कहा 'मम्मा मै जा नहीं रही हूँ ,बस पाँच दिन की ही तो बात है .मै आ रही हूँ'. उसके पिता जब उसके पास आये तो वो पिता के सीने से लगकर रोई नहीं वरन अपने पिता को धैर्य बंधाते हुए बोली .'पापा प्लीज आप रोना मत ,मै आपसे दूर नहीं जा रही हूँ, मै आपके पास हूँ ,जिस दिन आपको मेरी जरुरत हो एक फोन कर  देना मै आ जाउंगी'.
उसकी बात सुनकर हम जितने रिश्तेदार थे सब सोच रहे थे ये पागल हो गयी है क्या. .इसकी विदाई हो रही है और ये रोने की बजाय हंस रही है.इसे ये समझ में नहीं आ रहा है की ये अपने माँ- बाप से हमेशा के लिए दूर जा रही है.आज के बाद इसके ऊपर इसके माता -पिता का नहीं वरन उसकी ससुराल वालोका अधिकार होगा.हम सभी  रिश्तेदारों  के  मन में उथल -पुथल चल रही थी उसकी इस बचकानी हरकत पर.लेकिन फिर भी मन ने कहा की अभी उसकी आँखों में आंसू नहीं है ,जब गाड़ी में बैठेगी और परिवार वालो को आँखों में आंसू भरे हुए खड़ा   देखेगी तो अपने आप भावुक हो जाएगी. लेकिन उसने गाड़ी में बैठकर   बाय -बाय किया ,प्यारी सी मुस्कराहट  फेकी  और चली गयी. वो तो चली गयी  लेकिन आज की नारी का बदला हुआ   सशक्त स्वरुप छोड़ गयी .वो स्वरूप जिसमे नारी अबला नहीं सबला है .उसकी  आर्थिक निर्भरता ने उसे रोना नहीं बल्कि जिंदगी की चुनौतियों का सामना करना सिखाया है. हम लोगो ने जब  उससे पूछा     की वो रो क्यों नहीं रही है तो उसने जवाब दिया की मै सात सालो से बाहर हूँ  मुझे जितना  रोना था मै रो चुकी अब मै  क्यों  रोउंगी.  उसकी बात भी सही थी .हॉस्टल में   रेगिंग  के दौरान रोना क्या कम था .फिर  उत्तराखंड के द्वार हाट में सरकारी  इंजीनियरिंग कालेज की  असिस्टेंट प्रोफेस्सर के रूप में   उसकी पोस्टिंग का होना अपने आप में काफी बड़ी चुनौती थी .द्वारहाट वैसे ही जंगल है ,ऊपर से वहा शाम के छः बजे के बाद कोई घर से बाहर नहीं निकलता था  .क्यों की वहा के लोगो का मानना है की रात में वहा भूत प्रेत घूमते है .रात में सियारों का घूमना और आवाजे निकालना आम बात है.ऊपर से कालेज वालो ने उसे आवास भी निचले तल पर दिया वो भी ऐसी जगह जंहा अगल -बगल में कोई रहता ही नहीं था. न जाने कितनी राते उसने उस आवास में रो-रो के काटी थी.
 ऐसी ही एक घटना हमें  याद है जब   खड़गपुर आई- आई टी  द्वारा  उसे सेमिनार में बुलाया गया .  सेमिनार ख़त्म करजब  स्टेशन पर पहुंची तो पता चला की कोलकाता जाने वाली  रेल अभी -अभी निकल गयी .उसने वापस न जाकर  वही  स्टेशन  पर इंतजार किया और  दूसरी   रेल पकड कर वो कोलकाता के लिए रवाना हुयी  किन्तु  उसे ये देखकर बड़ी हैरानी हुयी की उस रेल में इक्का -दुक्का ही लोग थे .वो लेडिज केबिन में जा कर बैठ गयी .चुकी काफी थकी हुयी थी तो नींद आना  स्वाभाविक  था अभी वो झपकी ठीक से ले भी नहीं  पाई  थी  की तीन चार  जी आर पी एफ के जवान आकर उसके केबिन में बैठ गए .डर और घबराहट  से वो उठकर बैठ गयी. ये ठीक था की वो शरीफ लोग थे उसे कोलकाता पहुचने में तकलीफ नहीं हुयी .लेकिन इस दौरान वो किस मनोस्थिति से गुजरी होगी  एक -एक मिनट उसे घंटो से भी जयादा बड़ा लग रहा होगा इसका  अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. इस तरह के एक- दो नहीं वरन सात सालो में उसने न जाने कितनी चुनौतियों का सामना किया होगा  . पग -पग पर एक नया इम्तहान दिया होगा जिसने उसे  इतना मजबूत और  आत्मविश्वासी बना दिया की उसके लिए  ससुराल जाना ,विदाई होना जैसे अवसर बहुत मामूली बन गए .साथ ही उसकी  आर्थिक निर्भरता ने उसे स्वाभिमान और सम्मान के साथ जीना  सिखाया  . जीना  सिखाया  इस सोच के साथ की बेटिया परायी नहीं होती  बल्कि वे भी अपने माता -पिता की जिम्मेदारी को  बखूबी उठा सकती है.   उसकी विदाई ने समाज में महिलाओ की बदल रही तस्वीर का जो नमूना पेश किया ,उसने सोचने पर एवम चर्चा करने पर मजबूर कर दिया की क्या विदाई के समय पुरानी रीती के अनुसार बेटियों का रोना आवश्यक है  ,क्या उन्हें पराया धन समझना सही है या फिर बेटी भी बेटो की भाति हँसते हुए  अपनी  ससुराल ख़ुशी- ख़ुशी जा   सकती है. क्यों लोगो की सोच बदल नहीं पा रही है की   माता -पिता की सम्पति में बेटी  को  बेटो के बराबर  का  हिस्सा कानूनन दिया गया है तो फिर बेटी परायी कैसे हो सकती है. उसकी तकलीफ में उसका मायका पक्ष क्यों खड़ा नही हो सकता .क्यों शादी करने के बाद माता -पिता को लगता है की उन्होंने बेटी की शादी कर गंगा नहा ली .जबकि बेटे की शादी के बाद कोई ऐसे नहीं सोचता . आज भी बेटी का विदाई के समय न रोना अच्छा नहीं समझा जाता . लोग उसे गलत निगाह से देखते है.अक्सर लड़की न चाहते हुए भी  विदाई के समय  इसी लिए  रोती  है ,की समाज में सदियों से चली आ रही इस प्रथा से हटकर वो मजाक का कारण नहीं बनना चाहती .या  वो तब रोती है जब  वो आत्म निर्भर,आर्थिक  निर्भर नहीं होती . पैसो के लिए उसे   अपने पति  पर निर्भर  करना पड़ता है  ऐसी स्थिति  में उसे अपने पति के सही- गलत सारे फैसले न चाहते हुए भी स्वीकार करने पड़ते है. पति के चाहने पर ही वो अपने मायके वालो से रिश्ता रख पाती है. परन्तु जंहा आर्थिक  स्वाव -लम्ब्ता  है वहा आंसू बहाने की आवश्यकता नहीं पड़ती .वहा आवश्यकता है आपसी समझदारी की ,सुचारू रूप से घर चलाने की .आफिस और घर की जिम्मेदारी को बिना किसी तनाव के निभाने की .और ये तभी संभव है जब  ज्यादा से ज्यादा   लड़कियां  ऊँची शिक्षा पाकर अच्छी नौकरी करे ,ससुराल और मायके के  प्रति   अपने कर्तव्य को सही रूप से अंजाम दे .तब वे डोली में रोते हुए विदा नहीं लेंगी वरन एक आत्मविश्वास की चमक के साथ विदा लेगी की वो भविष्य में  अपने दायित्वों को सही तरह से निभा सकती है.