Monday, 19 March 2012

Naked dance for food.

  और कितना गिर सकते है.
अंडमान निकोबार भारत का  वो हिस्सा है जिसे ब्रिटिश काल में काला पानी की सजा के लिए याद किया जाता था और आज  भी सेलुलर जेल  और क्रन्तिकारी वीर सावरकर के लिए जाना जाता है . अचानक ब्रिटिश  समाचार पत्र    ११ , जनवरी २०१२,  ओब्सर्वर में  छपी    खबर 'नेकेड डांस फार फ़ूड ' ह्यूमन सफारी और 'ह्युमन जू 'ने फिर से अंडमान निकोबार को चर्चा में ला दिया है . इस बार चर्चा का विषय था जरावा आदिवासी, जो भारत की प्राचीन सभ्यता का अनन्य अंग है और इस अनन्य अंग का तमाशा बना दिया कुछ स्वार्थी ,धन लोभी तत्वों ने .जरावा आदिवासी जो अपने को ग्रामीण व् शहरी सभ्यता  से दूर रखते   थे , अचानक उनके जीवन में परिवर्तन आया और उस परिवर्तन का कारण बना  उनके क्षेत्र   से गुजरने वाला हाईवे .जरावस अपने घने जंगलो से निकल कर  सड़क पर गुजरने वाले वाहनों को रोककर खाने की वस्तु या तमाखू मांगते   ,( जरावस का खाना सुअर ,नारियल ,शहद ,केला आदि ) जबकि उस क्षेत्र में जाना कानूनन जुर्म है   ,परन्तु  जंहा लालच है वहा कानून मायने नहीं रखता . नतीजा   उनके बाहर आने  का क्रम बढ़ना शुरू हुआ जो वहा से गुजरने वालो के लिए किसी   अजूबे से कम नहीं लगता था .बस वही से आरम्भ होगया उनके  नग्न  और अर्धनग्न नृत्य को देखने वाले पर्यटकों के आवागमन का .उस रास्ते पर तैनात सुरक्षाकर्मी या उस क्षेत्र के पुलिस कर्मी जो पर्यटकों से भारी रकम लेकर जारवास के भोलेपन का फायदा उठाते और आगे भी उठाते रहते अगर ब्रिटिश पेपर  आब्सर्वर और गार्जियन भारत सरकार को सूचित न करते और अपनी सुचना के साथ ही इन आदिवासियों के नग्न-अर्धनग्न  वीडियो क्लिप नेट पर डालकर अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारत की बदनामी न करवाते तो शायद सोती हुयी सरकार और समाज को पता ही नहीं चलता की हमारे बीच कुछ धनलोभी आदिवासियों की अज्ञानता का फायदा उठा रहे है .ये हम भारतीयों के लिए  शर्म की बात है की लन्दन में स्थित संस्था 'सर्वाइवल' आदिवासियों के हितो की रक्षा के लिए कार्य करती है .उनको शोषण से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाती है और अपील करती है की जरावा जाने वाले रस्ते को बंद किया जाना चाहिए ,साथ ही उनकी जमीन को बाहरी लोगो के अधिग्रहण से बचाना  चाहिए .उनकी अपील पर ध्यान देते हुए सर्वोच्च कोर्ट ने २००२ में अपने फैसले को सुनाते हुए उस रस्ते को बंद करने के लिए कहा .किन्तु कुछ  धन -लोलुप  लोगो ने इसे हवा में उड़ाते हुए जरावस की अज्ञानता ,नग्नता और भुखमरी को कमाई का जरिया बना लिया .खाने का सामान देने के बहाने उनके करीब जाना और उन्हें इसी अवस्था में नचवाना उन्हें इतना रस आया की इसके लिए क्या देशी क्या विदेशी जो भी मोटी रकम  थमाता  उसे उनके बीच पंहुचा देते बिना ये सोचे की वे जो कर रहे है उससे उनके देश की गरिमा को कितनी ठेस पहुंचेगीं . अफ़सोस इस पर   आलोचना करना तो दूर देश के ठेकेदारों ने इस पर चर्चा करना भी उचित नहीं समझा .मीडिया ने भी आया राम ,गया राम की तर्ज पर इससे मुंह मोड़ लिया .क्योकिं इन आदिवासियों के पास न तो देने के लिए पैसा है और न ही इनका वोट.जबकि आज की इस तेज रफ़्तार वाले समय में एक हाथ लेना और एक हाथ देने का चलन है.फिर हम कैसे उम्मीद कर सकते है की हमारे नेता ,अफसर ,या समाजसुधारक इनके विषय में सोचेंगे .सोचा है तो सिर्फ और सिर्फ कोर्ट ने जिसने   इनके जिस्म की नुमाइश को सख्ती से रोका है. 

Sunday, 26 February 2012

मम्मा मै जा नहीं रही हूँ ,

मम्मा मै जा नहीं रही हूँ , 
मेरी भांजी की विदाई का समय था  ,हम सभी अपनी भावनाओ को नियंत्रण करने में खुद को असमर्थ पा रहे थे .वही वो चट्टान की तरह से मजबूत खड़ी मुस्करा रही थी .उसकी माँ बेटी की विदाई को होता देख फफक -फफक कर रोने लगी .बेटी ने अपनी माँ को सम्हालते हुए कहा 'मम्मा मै जा नहीं रही हूँ ,बस पाँच दिन की ही तो बात है .मै आ रही हूँ'. उसके पिता जब उसके पास आये तो वो पिता के सीने से लगकर रोई नहीं वरन अपने पिता को धैर्य बंधाते हुए बोली .'पापा प्लीज आप रोना मत ,मै आपसे दूर नहीं जा रही हूँ, मै आपके पास हूँ ,जिस दिन आपको मेरी जरुरत हो एक फोन कर  देना मै आ जाउंगी'.
उसकी बात सुनकर हम जितने रिश्तेदार थे सब सोच रहे थे ये पागल हो गयी है क्या. .इसकी विदाई हो रही है और ये रोने की बजाय हंस रही है.इसे ये समझ में नहीं आ रहा है की ये अपने माँ- बाप से हमेशा के लिए दूर जा रही है.आज के बाद इसके ऊपर इसके माता -पिता का नहीं वरन उसकी ससुराल वालोका अधिकार होगा.हम सभी  रिश्तेदारों  के  मन में उथल -पुथल चल रही थी उसकी इस बचकानी हरकत पर.लेकिन फिर भी मन ने कहा की अभी उसकी आँखों में आंसू नहीं है ,जब गाड़ी में बैठेगी और परिवार वालो को आँखों में आंसू भरे हुए खड़ा   देखेगी तो अपने आप भावुक हो जाएगी. लेकिन उसने गाड़ी में बैठकर   बाय -बाय किया ,प्यारी सी मुस्कराहट  फेकी  और चली गयी. वो तो चली गयी  लेकिन आज की नारी का बदला हुआ   सशक्त स्वरुप छोड़ गयी .वो स्वरूप जिसमे नारी अबला नहीं सबला है .उसकी  आर्थिक निर्भरता ने उसे रोना नहीं बल्कि जिंदगी की चुनौतियों का सामना करना सिखाया है. हम लोगो ने जब  उससे पूछा     की वो रो क्यों नहीं रही है तो उसने जवाब दिया की मै सात सालो से बाहर हूँ  मुझे जितना  रोना था मै रो चुकी अब मै  क्यों  रोउंगी.  उसकी बात भी सही थी .हॉस्टल में   रेगिंग  के दौरान रोना क्या कम था .फिर  उत्तराखंड के द्वार हाट में सरकारी  इंजीनियरिंग कालेज की  असिस्टेंट प्रोफेस्सर के रूप में   उसकी पोस्टिंग का होना अपने आप में काफी बड़ी चुनौती थी .द्वारहाट वैसे ही जंगल है ,ऊपर से वहा शाम के छः बजे के बाद कोई घर से बाहर नहीं निकलता था  .क्यों की वहा के लोगो का मानना है की रात में वहा भूत प्रेत घूमते है .रात में सियारों का घूमना और आवाजे निकालना आम बात है.ऊपर से कालेज वालो ने उसे आवास भी निचले तल पर दिया वो भी ऐसी जगह जंहा अगल -बगल में कोई रहता ही नहीं था. न जाने कितनी राते उसने उस आवास में रो-रो के काटी थी.
 ऐसी ही एक घटना हमें  याद है जब   खड़गपुर आई- आई टी  द्वारा  उसे सेमिनार में बुलाया गया .  सेमिनार ख़त्म करजब  स्टेशन पर पहुंची तो पता चला की कोलकाता जाने वाली  रेल अभी -अभी निकल गयी .उसने वापस न जाकर  वही  स्टेशन  पर इंतजार किया और  दूसरी   रेल पकड कर वो कोलकाता के लिए रवाना हुयी  किन्तु  उसे ये देखकर बड़ी हैरानी हुयी की उस रेल में इक्का -दुक्का ही लोग थे .वो लेडिज केबिन में जा कर बैठ गयी .चुकी काफी थकी हुयी थी तो नींद आना  स्वाभाविक  था अभी वो झपकी ठीक से ले भी नहीं  पाई  थी  की तीन चार  जी आर पी एफ के जवान आकर उसके केबिन में बैठ गए .डर और घबराहट  से वो उठकर बैठ गयी. ये ठीक था की वो शरीफ लोग थे उसे कोलकाता पहुचने में तकलीफ नहीं हुयी .लेकिन इस दौरान वो किस मनोस्थिति से गुजरी होगी  एक -एक मिनट उसे घंटो से भी जयादा बड़ा लग रहा होगा इसका  अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. इस तरह के एक- दो नहीं वरन सात सालो में उसने न जाने कितनी चुनौतियों का सामना किया होगा  . पग -पग पर एक नया इम्तहान दिया होगा जिसने उसे  इतना मजबूत और  आत्मविश्वासी बना दिया की उसके लिए  ससुराल जाना ,विदाई होना जैसे अवसर बहुत मामूली बन गए .साथ ही उसकी  आर्थिक निर्भरता ने उसे स्वाभिमान और सम्मान के साथ जीना  सिखाया  . जीना  सिखाया  इस सोच के साथ की बेटिया परायी नहीं होती  बल्कि वे भी अपने माता -पिता की जिम्मेदारी को  बखूबी उठा सकती है.   उसकी विदाई ने समाज में महिलाओ की बदल रही तस्वीर का जो नमूना पेश किया ,उसने सोचने पर एवम चर्चा करने पर मजबूर कर दिया की क्या विदाई के समय पुरानी रीती के अनुसार बेटियों का रोना आवश्यक है  ,क्या उन्हें पराया धन समझना सही है या फिर बेटी भी बेटो की भाति हँसते हुए  अपनी  ससुराल ख़ुशी- ख़ुशी जा   सकती है. क्यों लोगो की सोच बदल नहीं पा रही है की   माता -पिता की सम्पति में बेटी  को  बेटो के बराबर  का  हिस्सा कानूनन दिया गया है तो फिर बेटी परायी कैसे हो सकती है. उसकी तकलीफ में उसका मायका पक्ष क्यों खड़ा नही हो सकता .क्यों शादी करने के बाद माता -पिता को लगता है की उन्होंने बेटी की शादी कर गंगा नहा ली .जबकि बेटे की शादी के बाद कोई ऐसे नहीं सोचता . आज भी बेटी का विदाई के समय न रोना अच्छा नहीं समझा जाता . लोग उसे गलत निगाह से देखते है.अक्सर लड़की न चाहते हुए भी  विदाई के समय  इसी लिए  रोती  है ,की समाज में सदियों से चली आ रही इस प्रथा से हटकर वो मजाक का कारण नहीं बनना चाहती .या  वो तब रोती है जब  वो आत्म निर्भर,आर्थिक  निर्भर नहीं होती . पैसो के लिए उसे   अपने पति  पर निर्भर  करना पड़ता है  ऐसी स्थिति  में उसे अपने पति के सही- गलत सारे फैसले न चाहते हुए भी स्वीकार करने पड़ते है. पति के चाहने पर ही वो अपने मायके वालो से रिश्ता रख पाती है. परन्तु जंहा आर्थिक  स्वाव -लम्ब्ता  है वहा आंसू बहाने की आवश्यकता नहीं पड़ती .वहा आवश्यकता है आपसी समझदारी की ,सुचारू रूप से घर चलाने की .आफिस और घर की जिम्मेदारी को बिना किसी तनाव के निभाने की .और ये तभी संभव है जब  ज्यादा से ज्यादा   लड़कियां  ऊँची शिक्षा पाकर अच्छी नौकरी करे ,ससुराल और मायके के  प्रति   अपने कर्तव्य को सही रूप से अंजाम दे .तब वे डोली में रोते हुए विदा नहीं लेंगी वरन एक आत्मविश्वास की चमक के साथ विदा लेगी की वो भविष्य में  अपने दायित्वों को सही तरह से निभा सकती है.

Monday, 13 February 2012

क्या बलात्कार की बढती संख्या का कारण तंग और भड़काऊ कपडे है ?
 अख़बार पढ़ते -पढ़ते अचानक मेरी नजर हैदराबाद के डीजी पुलिस के बयाँ पर अटक गयी की लड़कियों द्वारा पहने जाने वाले तंग और भड़काऊ कपडे बलात्कार में बढती संख्या के लिए जिम्मेदार है .इधर हम खबर पढ़ रहे थे वही दूसरी ओर हमारी स्मृति पटल पर एक दृश्य तेजी से नाच रहा था .हुआ यू कि एक बार हम मेट्रो  में बैठे हुए अपने गंतव्य के आने का इंतजार कर रहे थे तभी अत्यंत आधुनिक वस्त्रो में सजी लड़की ने मेट्रो  के अन्दर कदम रखा ,उसका कदम रखना  था कि मजनु छाप लडको की बांछे  खिल गयी. सब अपनी जगह से सरक -सरक कर उससे   चिपकने की कोशिश करने लगे ये देख लड़की  अपनी जगह से हट   थोडा अन्दर की तरफ आ गयी .लेकिन उन मजनुऔ  को इतना धेर्य  कहा ,उन्होंने भी लड़की की बगल में अपने लिए जगह बना ली साथ ही अपनी घटिया हरकतों से उसे परेशान करना आरम्भ कर दिया  बस फिर क्या था लड़की ने घुमा कर चांटा एक के गाल पर रसीद कर दिया. ये देख कुछ महिलाओ के होठो पर जीत की मुस्कान बिखर गयी जबकि कुछएक उसके तंग कपड़ो को लेकर उसे बेहया ,बेशरम ,जैसे शब्दों से दबी जुबान में नवाजने लगी .उन महिलाओ की टिप्पड़ी पर मेरा मन कर रहा था की मै उनसे पलट कर सवाल करू की आप लोग  ढके पूरे कपडे साड़ी या सलवार सूट पहने हुए है. लेकिन  इसके बाद भी क्या आप मनचले ,आवारा लडको  की घटिया हरकत का शिकार नही बनती  क्या उनके अश्लील व्यंगो को नही झेलती है यहाँ तक की उनकी सीटिया काफी दूर तक आपका पीछा करती रहती है.हो सकता है की वो आपका पीछा करते -करते आपके घर तक भी पहुँच गया हो फिर भी आप ऐसे ओछे लडको को गलत न मानकर उस लड़की को दोष दे रही है  जिसकी   गलती  यही है  की उसने  आधुनिक कपडे पहने है.जबकि  सच्चाई   ये है की कुछ लोगो की मानसिकता ही  इतनी घटिया  होती है. की  उनके लिए   परिधान  नहीं वरन महिला होना ही काफी  होता है. उन्हें महिला के   रूप में मात्र भोग और मनोरंजन नजर आता है .इसी भोग का  आनंद उठाने के लिए कितनी बार दो महीने से लेकर छः महीने की बच्चियों तक को अपनी हवस का शिकार बना लेते है. यहाँ तक की नब्बे वर्ष की बूढी औरत भी नहीं छोड़ी जाती .और तो और कितने ही सगे रिश्तेदार   अपने ही खून को अपनी अतृप्त इच्छाओ की बेदी पर चढ़ा देते है. लडकिया कही सुरक्षित नहीं है.हर दस लड़की में से एक लड़की बलात्कार का शिकार बन रही है जिसकी रिपोर्ट समाज में  बदनामी  के भय से दर्ज ही नहीं करायी जाती .यही नहीं बहुत सी जगह पति के गुनाहों की सजा पत्नी के साथ सामूहिक बलात्कार  के रूप में  दी जाती है.अफ़सोस बलात्कार जैसे  जघन्य अपराध की सजा कानून की किताब में मात्र दस वर्ष की है ,और अगर अपराधी की पहुँच ऊपर तक है तो उसके लिए सजा से बचने के अनेक रास्ते है . ये सब कुछ इस लिए है क्योकि ये समाज पुरुष प्रधान समाज है .और महिला महज भोग करने की वस्तु .जिसे सीधे तौर पर हासिल न कर सको तो उसके लिए तरह -तरह के रास्ते इजाद कर दो जैसे की   दक्षिण में देवदासी प्रथा  जो अभी प्रतिबंधित है.ये वासना पूर्ति के लिए एक  लाइसेंस  था जिसकी आड़ में मनमानी करने की छुट .कभी किसी गरीब लड़की की सहायता करके या उसके परिवार को आर्थिक मदद  दे कर अपनी मर्जी चलाने  का मार्ग खोज लेता है. aor तो ओर चकले से लेकर वैश्यालय  तक बना डाले ,कालगर्ल ,मसाज पार्लर और न जाने कौन -कौन से   अय्याशी के साधन खोज ,. निकले लेकिन तृप्ति उसके बाद भी नहीं और होगी भी नहीं क्योकि संतुष्टि अधिकतर पुरुष के स्वभाव में है ही नहीं वो अपनी लोलुप्ता   का जामा स्त्री के छोटे होते हुए कपड़ो को बताकर अपने दामन को  पाक साफ कर लेना चाहता है .
,बहुत बार  समाज की नजर में अपने को दोष मुक्त साबित करने के लिए बलात्कार की शिकार युवती के साथ शादी करने की इच्छा भी जाहिर कर देता है.
 परन्तु हर समय पुरुष ही दोषी हो  ऐसा भी नहीं है  बहुत बार ऐसा भी होता है (10 out of 100) सौ में से दस महिलाये जब अपने प्यार को हासिल करने  में    नाकामयाब होती है तब जबरदस्ती बलात्कार का दोष बेकसूर व्यक्ति पर मढ़ कर उसे सजा दिलवाती है जो की गलत है .

Tuesday, 3 January 2012

Kya pros rahe hai ham Bachcho ko ?

क्या परोस रहे है हम बच्चों को ?
फोन पर बच्चे की प्यारी सी हंसी की खनक
जब हेल्लो के साथ सुनाई देती है तो  दूर बैठे  अभिभावक  का सारा तनाव  गुम हो जाता है .
दांत के डाक्टर के पास बैठे हम अपनी बारी आने की प्रतीक्षा कर रहे थे की तभी लगभग छः वर्ष की बच्ची ने अपनी माँ के साथ  चैंबर  में प्रवेश किया, उसे देख कर हम मुस्कुरा दिए जो उसे नागवार गुजरा और उसने दूर से बैठे -बैठे जवाब दिया भप -भप | तब तक अन्दर से उसके लिए बुलावा आ गया .हमने उसे छेड़ते हुए कहा ,"बहुत भप -भप कर रही थी ,जाओ -जाओ अब डाक्टर तुम्हे सुई लगाएगा" .बच्ची तो चली गयी लेकिन छोड़ गयी एक सवाल. क्या बच्चों के भविष्य के साथ हम खिलवाड़ कर रहे है ? क्या हम उनके प्रति लापरवाह है? क्या एक -दूसरे की देखा-देखी वाली दौड़ का हिस्सा है ? क्यों छोटे -छोटे बच्चे दांतों की शिकायत के साथ नजर आते है |क्यों बच्चे आँखों पर मोटा चश्मा लगाये दीखते है? क्यों बच्चे सर दर्द के नाम पर दवाइयों को  गुट्कते  रहते है ? ये वो कारण है जिनके जवाब हमें हर दुसरे घर में दिख जाते है, क्योकि आज अधिकतर बच्चे दूध नहीं पीते बल्कि कोल्ड ड्रिंक्स पीते है ,खाने में दाल,चावल, रोटी ,सब्जी कम खाते है चाइनीज ,पिज्जा ,बर्गर ,केक ,पैडिस आदि न जाने कौन -कौन सा फ़ूड खाते है.  अधिकतर मम्मियों को टीवी के धारावाहिक देखने से ही फुर्सत नहीं इस बीच अगर बच्चे ने खाना मांग दिया तो  नुडल्स या सूप बस दो मिनट की तर्ज पर हाजिर .बच्चे भी खुश और मम्मी भी .कामकाजी महिलाओ के पास समय नहीं बनाने का इसलिए वे टिन  पैक्ड  फ़ूड पर भरोसा करती है या होम डिलीवरी से काम चला लेती है .रविवार घर के जरुरी काम निपटाने के लिए होता है और शाम  RESTAURANT  में खाना खाने के लिए . सब कुल मिला कर सात दिनों में शायद ही तीन या चार दिन होते हो जब बच्चे घर का बना खाना खाते हो . "मीठे में खुछ हो जाये"  और वो चाकलेट हो तो इससे बेहतर और क्या हो सकता है . वैसे भी आधुनिकता की परिभाषा ही यही है की जी भर देशी -विदेशी   चौकलेट  खाओ और दांत के डाक्टर के पास लाइन लगाओ .दूध ,दही सलाद ,चने ,भुट्टे ये सब बेकार की बस्तुये है जिन्हें बच्चे छूना तो दूर देखने से भी बचते है .वैसे भी ये वस्तुएं पुराने फैशन के पर्याय है , पुराने फैशन के खान -पान से गाँव के बच्चे भी कैसे जुड़े रह सकते है .अब वे बगू कोल्ड ड्रिंक की बोतल लाल ,हरे ,नीले ,पीले पैकेट में चिप्स ,बिस्किट लिए दीखते है .गाँव की छोटी -छोटी गुमटीनुमा दुकानों में गर्मी के दिनों में छोटे  से लेकर बड़े आकार तक की बोतले झूलती  हुयी नजर आती है .जिन्हें अपने मेहमानों की खातिरदारी में पेश करना गौरव की बात समझी जाती है .ये गौरव तब और बढ़ जाता है जब आप का बच्चा कानो में हेडफोन  लगाये मोबाइल पाकेट में डाले आने वाले मेहमान के सामने खड़ा हो जाये या फिर किसी वीडियों गेम पर गेम खेलता दिख जाये या आपका नन्हा -मुन्ना टीवी के सामने आँखे चौड़ी किये कुत्ते -बिल्ली और चूहे को भागते  देख रहा हो .
टीवी का नशा .

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किन्तु इस थोथे अभिमान में या ग़लतफ़हमी में हम ये भूल जाते है की हम अपने बच्चो को परोस क्या रहे है.एक कमजोर शारीर जिसके पास दिमाग तो है लेकिन वो  केलकुलेटर  के बिना काम नहीं करता ,जुबान है तो किसी मनपसंद विज्ञापन या  फिल्म  और टीवी के किसी चरित्र के बोल  बोलने के लिए .कान है तो हेडफोन लगाये गाने सुनते है .हाथ है तो मोबाइल और कंप्यूटर पर गेम खेलते है.दिमाग होते हुए भी बच्चे मशीनों के बीच रहकर खुद मशीन बनगए .आज उनके पास अपने परिवार वालो के लिए समय नहीं है और न ही परिवार वाले जानना चाहते है की उनके बच्चो को क्या चाहिए .बच्चो को समय न दे पाने की असमर्थता को वो बच्चो की मांग के  अनुसार वास्तु दिला कर पूरी कर लेते है या फिर उसे विडियो गेम की नयी सीडी दिला कर अपने दायित्व की इतिश्री कर लेते है. और बच्चा उनकी कमी को  मशीनों से पूरा करने के लिए विवश है .उन मशीनों से जिन्हें जरुरत पड़ने पर उपयोग करने के लिए बनाया गया है न की उन्हें नशे के रूप में इस्तेमाल करने के लिए . ये नशा बच्चो को कितना महंगा पड़ेगा इसे अभिभावक समझना ही नहीं चाहते हा ये शिकायत अवश्य करते है की आजकल के बच्चो के पास माता -पिता को देने के लिए समय नहीं है .किन्तु ये नहीं समझना चाहते की जिन मशीनों की व् गलत खान -पान की आदत उन्होंने अपने बच्चो को डलवाई है वे आदते बच्चो से आँखों की रौशनी ,सुनने की शक्ति  को छीन रही है .नर्व की समस्या को जन्म दे रही है .अगर समय रहते नहीं चेते तो आने वाला समय बच्चो को एक कमजोर शारीर के साथ अंधकारमय भविष्य अवश्य देंगा वो भविष्य जिसमे न बचपन होगा न जवानी कुन्तु स्थायी बुढ़ापा जरुर होंगा .


Sunday, 1 January 2012

SHAKUN TRIVEDI: Tujhe to Aana hai Bar -Bar.

SHAKUN TRIVEDI: Tujhe to Aana hai Bar -Bar.

Tujhe to Aana hai Bar -Bar.



आने वाले नए साल से अपने दिल के   दर्द को बयां करती  हुयी चंद  महीनों में मरने वाली कैंसर पीड़ित महिला की व्यथा  

 तुझे तो आना है बार-बार 

ऐ नए साल तू आयेगा  इठलायेगा इतराएगा 
मदमस्त खुश्बू से जग को नहलाएगा 
और मै
नहीं देख पाऊँगी  तेरी चमक,तेरी  सादगी 
मै ठहरी अभागी 
चंद सांसे है बाकि .


 सुन मुझे देना है तुझे जिम्मेदारियों का भार 
जो अबतक था मेरे जीवन  का आधार 

कल को
 मै तो रहूंगी नहीं किन्तु तुझे तो आना है बार -बार 

देख मेरी बेटी बड़ी भोली है ,
इसकी तो नहीं उठी अभी डोली है 
खुशियों की उम्र , सब से   बेफिक्र 
रखना तू इसका ख्याल , 
जिंदगी   में इसके  रहे न  कोई मलाल .

कल को
 मै तो  रहूंगी नहीं किन्तु तुझे तो आना है बार-बार 

मेरा बेटा बड़ा चंचल है ,हरपल रहती इसके मन में बड़ी हलचल है,
ये ठहरा नादान,भले -बुरे की इसे कहा पहचान  
इसे लेना सम्हाल ,चंद खुशियाँ इसकी झोली में देना तू डाल 
न महसूस हो इसे कभी मेरी कमी ,अभी तो इसकी उम्र बड़ी लम्बी पड़ी .

कल को 
मै तो रहूंगी नहीं किन्तु तुझे तो आना है बार-बार 

मेरे पति हो जायेंगे अनाथ 
सर पर नहीं इनके माँ बाप का भी हाथ 
तब तू देना इनका साथ 
नहीं सह पाएंगे ये जुदाई का आघात 
कल को 
मै तो रहूंगी नहीं किन्तु तुझे तो आना है बार-बार 

सहसा छलछलाई आंखे जिनमे समायी थी आहें 
धीरे से डोली ,मन ही मन बोली 
काश मुझे मिल जाती चन्द सांसे उधार 
   जी भर  करती तेरा सत्कार 
नहीं देती कभी जिम्मेदारी का इतना बड़ा भार
इतना बड़ा भार .

Saturday, 31 December 2011

देश का दुर्भाग्य

  
 भारत आज भी अथाह सम्पदा का मालिक है .उसके गर्भ में अनेक बेशकीमती खनिज पदार्थ समाये हुए है . उन्ही में से कोयला भी है जो करोडो -अरबो की सम्पति है ,जिसकी देख-रेख के लिए, सही उत्खनन के लिए कितने वैध खदान बनाये गए है जहा समस्त सुविधाओ का ध्यान रखने की कोशिश की जाती है .किन्तु लूट्ने वाली मानसिकता के शिकार लोग वंहा भी सेंध मारने से बाज नहीं आते और तो और बड़े -बड़े अवैध कोयला खदान ,अवैध उत्खनन ,,अवैध डिपो इतने धड़ल्ले से चल रहे है कि जिन्हें देख कर अपने आप ही समझा जा सकता है कि इतना बड़ा काम बिना ऊपर तक पहुँच बनाये सुचारू रूप से चलाना संभव नहीं है . जहा अधिकतर  लोग पैसा बनाने में विश्वास रखते हो वंहा अवैध कारोबार करना कौन सा मुश्किल काम है.,फिर वो कोयला ,भू ,पेर्टोलियम,वन ,जीव -जंतु कुछ भी हो , क्या फर्क पड़ता है . यही वजह है जितने वैध कोयला खदान नहीं है उससे तीन गुना ज्यादा अवैध खदाने है जिनकी न कोई गिनती है न कोई गिनने वाला .जहा दुर्घटनाये होना आम बात है किन्तु उनकी पुष्टि बिना साक्ष्य के करना मुश्किल.और हो भी कैसे जिस अवैध धन को उगाहने का ये ताना -बाना है उसी ताने-बाने के शिकार अधिकतर पत्र -पत्रिकाए ,पत्रकार ,प्रशासन एवं कुछ RAJNITIGY भी है ,जिनकी जेब में माल  दुर्घटना होने के साथ ही पहुँच जाता है और वे माल रूपी स्वर्गीय सुख को प्राप्त करने के लिए किसी भी हद तक समझौते कर लेते है .वैसे इसमें बुराई क्या है सभी तो यही कर रहे है तो वे क्यों न बहती गंगा में हाथ धो ले इसी सोच के साथ वे इसे सहर्ष स्वीकार करते है और मन में उपजी ग्लानी बोध से मुक्ति पा लेते है .दूसरी ओर उस दुर्घटना स्थल में हादसे के शिकार मजदूर या तो कल का ग्रास बन जाते है या फिर उस भयानक कई सौ मीटर बिना हवा की लंबी गुफा में दब कर मरने को विवश हो जाते है ,आस -पास के लोग कोयला माफिया के खौफ से डर कर अपनी इंसानियत को कुचलता हुआ देखते रहते है ,उन मृतक मजदूरो के परिवार के लोग रुपयों का बड़ा बण्डल देख आपने आंसू पोंछ लेते है और करे भी क्या ,क्योकि जिन अवैध खदानों में उनके परिजन हादसे का शिकार हुए है ,उन खदानों में काम करना गैर क़ानूनी है . ऐसी स्थिति में उनकी शिकायत न पुलिस सुनेगी और न मदद मिलेगी फिर इन पचड़ो में बेवजह पड़ने से क्या फायदा .बस यही मूल मंत्र है जिसके बल पर गैर कानूनन काम बेफिक्री से चल रहा है .किन्तु दुःख होता है ये देखकर कि हमारे देश का दुर्भाग्य है कि पहले उसकी अपार सम्पति को लूट्ने महमूद गजनवी से लेकर नादिरशाह तक आये और बाद में लगभग दो सौ वर्षो तक अंग्रजो ने जी भरकर लूटा ,अब उसके अपने लोग अपनी अतृप्त धन कि प्यास को बुझाने लिए अपने ही देश को लूट्ने में लगे हुए है ,जिसको जहा भी कुछ नजर आ रहा है वो उसे हड़पने में लगा है ,बिना ये सोचे कि वो अपने ही देश को खोखला कर रहा है .कानून ,अनुशासन ,ईमानदारी ,देशप्रेम जीवित होते हुए भी अपने को अकेला व् लाचार पा रहे है .माफियाओ के हिमालय रूपी कद के सामने वे अपने को बौना महसूस कर रहे है किन्तु जिस दिन उन्हें अपनी ताकत का अहसास होगा उस दिन वे चींटी के सामान होते हुए भी हाथी को मरने में सक्षम होगे और रौंद डालेंगे भ्रष्ट ,लालची जमात को जो जनता कि मेहनत और मजदूरी पर अपने सुख की ईमारत को बनाने और सजाने में लगी  है .