Sunday, 1 January 2012
Tujhe to Aana hai Bar -Bar.
आने वाले नए साल से अपने दिल के दर्द को बयां करती हुयी चंद महीनों में मरने वाली कैंसर पीड़ित महिला की व्यथा
तुझे तो आना है बार-बार
ऐ नए साल तू आयेगा इठलायेगा इतराएगा
मदमस्त खुश्बू से जग को नहलाएगा
और मै
नहीं देख पाऊँगी तेरी चमक,तेरी सादगी
मै ठहरी अभागी
चंद सांसे है बाकि .
सुन मुझे देना है तुझे जिम्मेदारियों का भार
सुन मुझे देना है तुझे जिम्मेदारियों का भार
जो अबतक था मेरे जीवन का आधार
कल को
मै तो रहूंगी नहीं किन्तु तुझे तो आना है बार -बार
देख मेरी बेटी बड़ी भोली है ,
इसकी तो नहीं उठी अभी डोली है
खुशियों की उम्र , सब से बेफिक्र
रखना तू इसका ख्याल ,
जिंदगी में इसके रहे न कोई मलाल .
कल को
मै तो रहूंगी नहीं किन्तु तुझे तो आना है बार-बार
मेरा बेटा बड़ा चंचल है ,हरपल रहती इसके मन में बड़ी हलचल है,
ये ठहरा नादान,भले -बुरे की इसे कहा पहचान
इसे लेना सम्हाल ,चंद खुशियाँ इसकी झोली में देना तू डाल
न महसूस हो इसे कभी मेरी कमी ,अभी तो इसकी उम्र बड़ी लम्बी पड़ी .
कल को
मै तो रहूंगी नहीं किन्तु तुझे तो आना है बार-बार
मेरे पति हो जायेंगे अनाथ
सर पर नहीं इनके माँ बाप का भी हाथ
तब तू देना इनका साथ
नहीं सह पाएंगे ये जुदाई का आघात
कल को
मै तो रहूंगी नहीं किन्तु तुझे तो आना है बार-बार
सहसा छलछलाई आंखे जिनमे समायी थी आहें
धीरे से डोली ,मन ही मन बोली
काश मुझे मिल जाती चन्द सांसे उधार
जी भर करती तेरा सत्कार
नहीं देती कभी जिम्मेदारी का इतना बड़ा भार
इतना बड़ा भार .
Saturday, 31 December 2011
देश का दुर्भाग्य
भारत आज भी अथाह सम्पदा का मालिक है .उसके गर्भ में अनेक बेशकीमती खनिज पदार्थ समाये हुए है . उन्ही में से कोयला भी है जो करोडो -अरबो की सम्पति है ,जिसकी देख-रेख के लिए, सही उत्खनन के लिए कितने वैध खदान बनाये गए है जहा समस्त सुविधाओ का ध्यान रखने की कोशिश की जाती है .किन्तु लूट्ने वाली मानसिकता के शिकार लोग वंहा भी सेंध मारने से बाज नहीं आते और तो और बड़े -बड़े अवैध कोयला खदान ,अवैध उत्खनन ,,अवैध डिपो इतने धड़ल्ले से चल रहे है कि जिन्हें देख कर अपने आप ही समझा जा सकता है कि इतना बड़ा काम बिना ऊपर तक पहुँच बनाये सुचारू रूप से चलाना संभव नहीं है . जहा अधिकतर लोग पैसा बनाने में विश्वास रखते हो वंहा अवैध कारोबार करना कौन सा मुश्किल काम है.,फिर वो कोयला ,भू ,पेर्टोलियम,वन ,जीव -जंतु कुछ भी हो , क्या फर्क पड़ता है . यही वजह है जितने वैध कोयला खदान नहीं है उससे तीन गुना ज्यादा अवैध खदाने है जिनकी न कोई गिनती है न कोई गिनने वाला .जहा दुर्घटनाये होना आम बात है किन्तु उनकी पुष्टि बिना साक्ष्य के करना मुश्किल.और हो भी कैसे जिस अवैध धन को उगाहने का ये ताना -बाना है उसी ताने-बाने के शिकार अधिकतर पत्र -पत्रिकाए ,पत्रकार ,प्रशासन एवं कुछ RAJNITIGY भी है ,जिनकी जेब में माल दुर्घटना होने के साथ ही पहुँच जाता है और वे माल रूपी स्वर्गीय सुख को प्राप्त करने के लिए किसी भी हद तक समझौते कर लेते है .वैसे इसमें बुराई क्या है सभी तो यही कर रहे है तो वे क्यों न बहती गंगा में हाथ धो ले इसी सोच के साथ वे इसे सहर्ष स्वीकार करते है और मन में उपजी ग्लानी बोध से मुक्ति पा लेते है .दूसरी ओर उस दुर्घटना स्थल में हादसे के शिकार मजदूर या तो कल का ग्रास बन जाते है या फिर उस भयानक कई सौ मीटर बिना हवा की लंबी गुफा में दब कर मरने को विवश हो जाते है ,आस -पास के लोग कोयला माफिया के खौफ से डर कर अपनी इंसानियत को कुचलता हुआ देखते रहते है ,उन मृतक मजदूरो के परिवार के लोग रुपयों का बड़ा बण्डल देख आपने आंसू पोंछ लेते है और करे भी क्या ,क्योकि जिन अवैध खदानों में उनके परिजन हादसे का शिकार हुए है ,उन खदानों में काम करना गैर क़ानूनी है . ऐसी स्थिति में उनकी शिकायत न पुलिस सुनेगी और न मदद मिलेगी फिर इन पचड़ो में बेवजह पड़ने से क्या फायदा .बस यही मूल मंत्र है जिसके बल पर गैर कानूनन काम बेफिक्री से चल रहा है .किन्तु दुःख होता है ये देखकर कि हमारे देश का दुर्भाग्य है कि पहले उसकी अपार सम्पति को लूट्ने महमूद गजनवी से लेकर नादिरशाह तक आये और बाद में लगभग दो सौ वर्षो तक अंग्रजो ने जी भरकर लूटा ,अब उसके अपने लोग अपनी अतृप्त धन कि प्यास को बुझाने लिए अपने ही देश को लूट्ने में लगे हुए है ,जिसको जहा भी कुछ नजर आ रहा है वो उसे हड़पने में लगा है ,बिना ये सोचे कि वो अपने ही देश को खोखला कर रहा है .कानून ,अनुशासन ,ईमानदारी ,देशप्रेम जीवित होते हुए भी अपने को अकेला व् लाचार पा रहे है .माफियाओ के हिमालय रूपी कद के सामने वे अपने को बौना महसूस कर रहे है किन्तु जिस दिन उन्हें अपनी ताकत का अहसास होगा उस दिन वे चींटी के सामान होते हुए भी हाथी को मरने में सक्षम होगे और रौंद डालेंगे भ्रष्ट ,लालची जमात को जो जनता कि मेहनत और मजदूरी पर अपने सुख की ईमारत को बनाने और सजाने में लगी है .
Wednesday, 14 December 2011
Ganga sagar Jan. 2012
यात्रा आस्था ,विश्वास ,श्रद्धा ,अर्पण और तर्पण की
यात्रा गंगासागर की,
किन्तु पक्षियों को चुगाना बहुत ही अनंदायी था , ये दृश्य अत्यधिक लुभावना था , किन्तु भीड़ की वजह से हम कैमरे में ठीक से कैद भी नहीं कर पाए . विभिन्न प्रकार के पक्षी झुण्ड के साथ दानो को लेने के लिए झपट रहे थे .पक्षियों को चुगाने का एक अलग ही आनंद आ रहा था ,लेकिन ताज्जुब तो तब हुआ जब लौटते समय एक भी पक्षी दिखाई नहीं दिया.शायद मूक पक्षी भी जानते है की जाते समय ही लोग उन्हें दाना देंगे ,वापसी में तीर्थयात्री अपनी दान की झोली खाली करके लौटते है और उनमे इतनी न तो ताकत होती है न ही जिज्ञासा की वे फिर से उन्हें दाना डाले. लांच से उतर कर कुचुबेडिया आये, जहाँ से अभी भी ३० किलोमीटर जाना बाकि था ..जिसके लिए बस ,कार ,जीप आदि उपलब्ध रहती है .जिसकी जैसी सामर्थ वो वैसी सुविधा ले सकता है . बस का भाडा यहाँ भी पंद्रह (15 upye per head) है . किन्तु गाड़ी वालो से मोल-भाव करना पड़ता है. गंगासागर पहुँच कर वहा पर स्थित बहुत से सेवाश्रम है उनमें अपने रहने की व्यवस्था करनी होती है .लेकिन हम लोग पहले से ही भारत सेवासंघ आश्रम में अपने लिए ग्यारह रुपये प्रत्ति कमरे के हिसाब से दो कमरे आरक्षित करवा चुके थे .बड़े -बड़े कमरे बाथरूम की सुविधा के साथ प्रथम तल्ले पर मिल गए .भारत सेवाश्रम काफी सुन्दर है. इसी आश्रम में काफी बड़ा मंदिर है इसकी सुबह -शाम की आरती मन मोह लेती है. इसके आलावा यहा २४ (24 ) घंटे बत्ती रहती है..भोग का खाना पंद्रह रूपये की स्लिप कटाने पर आसानी से उपलब्ध हो जाता है.लेकिन ये स्लिप पहले से कटानी होती है अन्यथा आपको खाना नहीं मिलेगा .वैसे गंगासागर के होटलों में खाना काफी कम दाम पर मिलता है.जैसे की बीस रूपये में चार रोटी ,दाल,सब्जी और आलू भाजा.( पतले आकार में आलू काट कर उन्हें नमक मिला कर तबतक तलना जब तक की वे लाल न हो जाये और फिर खाने के साथ देना )ये बंगाल के खाने का अहम् हिस्सा है.अगर कोई रोटी नहीं खाना चाहता तो उसे चावल खाने में देते है.अगर किसी के लिए इतना खाना कम है तो तीस रूपये में मन चाहा खाना खाइए .बढ़िया चाय पांच रूपये में . गंगासागर की एक विशेषता है की वहा के दुकानदार हिंदी समझते है इसलिए तीर्थयात्रियों को तकलीफ नहीं होती . गंगासागर का मुख्य बाजार इसी आश्रम के सामने है. कपिलमुनि का आश्रम यहाँ से १. किलोमीटर ( 1.km.) है.और कपिलमुनि आश्रम से गंगासागर भी १.किलोमीटर ( 1.km.) की दूरी पर है .
यात्रा गंगासागर की,
| लोकल ट्रेन के अन्दर का दृश्य |
सुना था की लोग अपने वृद्ध माता-पिता को गंगासागर तीर्थ कराने के बहाने गंग्सागर में छोड़ कर चले जाते है.ठीक वैसे ही जैसे कि बृन्दावन ,और बनारस में वृद्ध महिलाओं को छोड़ कर लोग आ जाते है.बस फिर क्या था हम लोगो ने निश्चय कर लिया कि हम सभी गंगासागर जायेंगे पता करने के लिए कि इस कथ्य में कितनी सच्चाई है .बस सबेरे ही हम लोग पंहुच गए सियालदह स्टेशन पर लोकल ट्रेन पकड़ने के लिए .सात बजे वाली लोकल जिसका भाडा मात्र पंद्रह रुपये था,पकड़ कर ठीक तीन घंटे में हम लोग काकद्वीप पहुँच गए.काकद्वीप एक छोटा सा स्टेशन है जिसमे चहल -पहल कम ही होती है. फिर भी यात्रियों कि सुविधा के लिए छोटी -छोटी चाय कि दुकान है ,जंहा चाय के साथ बिस्किट व् मुड़ी (लहिया, मूंगफली ,व् चनेके साथ ) मिलती है.इन दुकानों में एक खासियत ये भी है कि अगर आपने चाय पीने के पहले ताक-झाक नहीं कि तो हो सकता है कि दुकान वाली महिलाये आपको रक्खी हुयी चाय गरम कर पिला दे .काकद्वीप से जेटी नंबर 8 लगभग 9 किलोमीटर है.
| वेंन यात्रा, काकद्वीप से जेटी नंबर 8, 9 kilomitar की दूरी पर है. |
लांच में चलने वाली तीन फिटि भिखारिन
|
| भारत सेवाश्रम संघ में बने मंदिर के पुजारी के साथ लेखिका शकुन त्रिवेदी एवं एक भक्त
नीचे समुन्दर में नहाते कुछ भक्त . |
| यहाँ पर दूर -दूर से तीर्थयात्री बारहों महीने आते है. इनमे से कितने लोग तो हिंदी जानते ही नहीं .हम लोगो ने वहा पर उपस्थित ऐसे ही कुछ तीर्थयात्रियो का फोटो लिया ,वे लोग हमारी भाषा तो नहीं समझ रहे थे लेकिन ये देखकर की हम फोटो खिंच रहे है ,बहुत खुश हो रहे थे .वही पर कुछ बहुएं अपनी सास को नहला रही थी तो कुछ जवान लड़के अपने साथ आये हुए बुजुर्गो की सेवा कर रहे थे .ये देख पाश्चात्य सभ्यता में तेजी से परवर्तित होने वाले भारत की छवि धूमिल पड़ रही थी और उस की जगह ले रही थी माता-पिता की सेवा के लिए उदाहरण बने श्रवण कुमार की परंपरा . |
| गंगासागर का तट पर अठखेलियाँ खेलती लहरों के साथ फोटो सेशन |
| गंगासागर तट पर शकुन त्रिवेदी छोटे से कुत्ते के बच्चे व् उसकी माँ के साथ गंगासागर में सैकड़ो कुत्ते दैनिक ही आते है और लोग उन्हें बिस्किट या ब्रेड खिलाते है. उनमे से कुछ कुत्ते तो काफी जख्मी भी थे ,उनके जख्म देखकर बहुत तकलीफ हो रही थी लेकिन बस में कुछ नहीं था ,इसलिए उधर से नजरे घुमा कर दूसरी जगह पर टिका दी वैसे भी कहावत है की आँख ओझल तो पहाड़ ओझल . |
| गंगासागर क्षेत्र में स्थित दुकान में असली -नकली मोतियों के बारे में बताता दुकानदार बहुत से दुकानदार मोतियों पर केमिकल लगा कर ग्राहक के सामने उसे जला कर दिखाते है की देखिये असली मोती की ये पहचान है की वो आग में जलता नहीं जबकि ज्यादातर लोग सिंथेटिक मोती बेंच रहे है. अब तो चाइना के भी मोती बाजार में आने लगे है .जिनमे चमक काफी होती है और वो ग्राहकों का ध्यान आसानी से अपनी ओरआकर्षित कर लेते है. |
| बड़े -बड़े काढावो में खजूर का गुड बनता हुआ . |
| ग्राहक को खजूर के गुड का शीरा चखाती हुयी महिला |
हम लोगो ने भारत सेवाश्रम के पास ही एक छोटा सा बोर्ड लगा देखा की यहाँ खजूर का गुड मिलता है .बस पहुँच गए पता करने .छोटा सा घर उसके बाहर में बड़ी सी भट्टी और उसपर उबलता हुआ खजूर का रस .देखा की वहा तो कोई है ही नहीं जिससे बात की जाये गुड के सम्बन्ध में .इसलिए हमने सोचा की क्यों न पहले कुछ फोटो खीच ली जाये .उसके बाद देंखे की कोई घर के अन्दर है या नहीं .फोटो खीचने के बाद हम ने दो चार बार आवाज लगायी की 'कोई है, घर में कोई है,' तभी एक दुबली पतली सी महिला घर के बाहर आई .जिसे देखकर ये समझ में आ गया की ये घर के अन्दर खाना पका रही थी .वो हम लोगो को आया देख खुश हो गयी . उससे बात करने का सबसे बेहतरीन बहाना था गुड को खरीदना .हमने जैसे ही पूछा की "गुड क्या भाव दिया" उसने पलट कर प्रश्न दागा की 'कौनसा गुड ,पाटाली या शीरा '.एक मिनट के लिए हम मौन हो गए की ये क्या बोल रही है .लेकिन हमारे साथ जो बंगाली सज्जन थे उन्होंने बताया की पाटाली मतलब जमा हुआ गुड और शीरा मतलब थोडा सा तरल.जिसके साथ रोटी खाने में बहुत अच्छी लगती है.खैर हमने 1kg पाटाली गुड की मांग रखी जिसे उसने ७० रूपये के भाव पर हमें दिया और हमारे साथ वाले सज्जन को ५५ रूपये केजी के हिसाब से शीरा दिया .उससे बात करने पर हम लोगो को खजूर के गुड को बनाने की कहानी पता चली ,कैसे लोग भोर बेला में ही खजूर के पेड़ के पास पहुँच जाते है ,वहा पहुच कर पेड़ पर चढ़ना फिर जिस मटकी को खजूर का रस निकलने के लिए पेड़ के तने से बांधा था उसे खोलकर लाते है उसके बाद जितनी मटकियो को पेड़ से उतारा गया उन्हें साईकिल पर या किसी लकड़ी के डंडे पर बांध कर अपने घर लायेंगे .वहा उन्हें छानकर बड़े -बड़े काढावो में डाला जायेगा और फिर कमसेकम ४-५ घंटे लगातार भट्टी पर डालकर खौलाया जायेगा .जब तक की ये पूरी तरह से सूख न जाये इस दौरान गुड के रस को लगातार चलाना पड़ता है अन्यथा रस तली में चिपक कर जल जायेगा .इससे रस में या गुड के स्वाद में जले की दुर्गन्ध आ जाएगी . ये सुनते ही हमें बहुत पहले अमिताभ बच्चन की देखी हुयी पिक्चर सौदागर ( नूतन जिसमे अभिनेत्री थी ) याद आ गयी .
| खजूर के गुड का शीरा जिसे बिक्री के लिए बर्तनों में भरकर रक्खा गया है. |
| तीर्थ यात्रियों से भरा हुआ लांच |
| गंगा सागर में गायों का झुण्ड , ये आकार में अन्य गायो की तुलना में छोटी होती है और दूध भी कम देती है. |
| लांच से उतरते तीर्थयात्री |
| ( 8 ) आठ नंबर लांच के पास दलदल में समाया बच्चा लोगो से पैसा फेकने के लिए कह रहा है. लौटते समय हमने बहुत से बच्चो को देखा ,जिनमे से कुछ कपडे पहने हुए थे तो कुछ एकदम नंगे बदन दलदल में समाये हुए पैसे मांग रहे थे .कई बार ये पैसा न मिलने पर यात्रियों के ऊपर मिटटी भी फेंक देते थे .और पैसा मिलने पर बाकि बच्चो के साथ तुलना करते थे की आज किसकी आमदनी कितनी ज्यादा हुयी.इनमे से जरूरतमंद बच्चे बहुत कम थे वरन वे अपने खुद के खर्चे ,जैसे कि thumsup ,चिप्स आदि खरीद सके .
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| सूखती हुयी मछलिया , बंगाल के ग्रामीण इलाको का सबसे बड़ा व्यवसाय. |
गंगासागर जाते समय काकद्वीप से उतर कर जेटी नंबर ८ तक पहुचने वाले मार्ग पर बहुत सी जगह मछलिया सूखती हुयी दिखाई देती है.उन मच्छलियों को सुखाने का कार्य अधिकतर महिलाये करती है . ये मछलिया सूखने के बाद बाहर बहुतायत में भेजी जाती है.ये बंगाल के ग्रामीण इलाको का सबसे बड़ा व्यवसाय है. किन्तु जब इनके पास से गुजरते है तो इनकी गंध जो लोग मछली नहीं खाते उनके लिए असहनीय हो जाती है .
| 'द वेक' टीम गंगा सागर मेले के समय तीर्थयात्रियों के लिए निर्धारित किराया : |
विभिन्न स्थानों से गंगासागर तीर्थयात्रियों के बस, टैक्सी, लंच, वैन रिक्शा इत्यादि वाहनों के किराए को प्रशासन ने निर्धारित कर दिया है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए आउट्राम घाट पर पीएचई की ओर से किराए की तालिका लगाई गई है। इसके अनुसार विभिन्न स्थानों से किराए इस प्रकार हैं-
-हावड़ा स्टेशन से नामखाना तथा हावड़ा स्टेशन से हारउड प्वाइंट तक का बस किराया- 65 रूपए
-आउट्राम से नामखाना तथा आउट्राम से हारउड प्वाइंट तक का बस किराया- 60 रूपए
- कचूबेड़िया से सागर के लिए बस भाड़ा- 30 रूपए तथा चेमागुड़ी से सागर तक का बस किराया- 20 रूपए
- लाट-8 से कचूबेड़िया तक का लांच किराया- 40 रूपए
-नामखाना से चेमागुड़ी तक लांच किराया- 75 रूपए
-कचूबेड़िया से सागर तक ट्रेकर व मिनी बस किराया- 25 रूपए
- कचूबेड़िया से सागर तक रिजर्व अंबेसेडर व टैक्सी किराया- 450 रूपए
- कचूबेड़िया से सागर तक रिजर्व मारुति भाड़ा- 470 रूपए
- कचूबेड़िया से सागर तक रिजर्व टाटा सूमो का किराया -550 रूपए
काकद्वीप रेलवे स्टेशन से लाट-8 तथा चेमागुड़ी से सागर तक के लिए वैन रिक्शा का किराया-15 रूपए।

Tuesday, 6 December 2011
Tuesday, 15 November 2011
A journey towards Black Hole .
दो हजार फीट जमीं के नीचे,
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| केंद्रीय कोयला मंत्री श्री श्रीप्रकाश जायसवाल |
| 'THE WAKE' S NEWS EDITOR RAJESH MISHRA, CHIEF EDITOR SHAKUN TRIVEDI & SHUBHRANSHU |
मेरी द्रढ़ता को देखते हुए वो तैयार हो गया.सुबह जब हम तैयार हो गए तो राजेश का फोन आया की उसे क्या करना चाहिए ,साथ चले या नहीं .हमने ये कह कर "तुम्हारी जैसी इच्छा" बात ख़त्म कर दी| निकलते समय हमने मनोज जी को जगा कर बताया भी नहीं की हम जा रहे है क्योकि हम जानते थे की सुबह - सुबह हमें जाते देख कर उनका दिन ख़राब हो जायेगा और उनका बिगड़ा मिजाज देख कर हमारा | गेट से बाहर निकल कर हम जैसे ही टेक्सी में बैठने के लिए आगे बढे राजेश साथ में आ गया .इस तरह हम तीनो आसनसोल के लिए निकल पड़े .ब्लेक डायमंड साढ़े चार घंटे का समय लेती है कोलकाता से कुल्टी पहुचाने में | साढ़े दस के लगभग हम लोग कुल्टी में थे |स्टेशन पर पवन हम लोगो को लेने आया था | गाड़ी में बिठालने के बाद उसने हमलोगों को कुल्टी एवं कोयला अंचल और उनके कारोबारियों के बारे में बताना आरम्भ कर दिया | इसके बाद वो हम लोगो को अपने घर ले गया वहा चाय नाश्ता करा के कुल्टी के कोयला स्थलों को दिखाना आरंभ किया .वो एक के बाद एक कुछ नया बताता जा रहा था और हम चुपचाप सुन रहे थे लेकिन संतुष्टि नहीं थी . शायद उसने ये भांप लिया था इसलिए वो हमें सीधे भारत की सबसे गहरी कोयला खदान व् संसार में दुसरे पायदान पर विराजमान चिनाकुड़ी कोयला खदान के मैनेजर से मिलवाने ले गया.इस बीच उसका दोस्त व् आसनसोल दैनिक जागरण का संवाददाता रविशंकर चौबे भी हम लोगो के साथ आ गए |चिनाकुड़ी के मैनेजर ,डिप्टी मैनेजर एस .ऍन सिंह, इंजीनयर सुरजीत बोस ने हम लोगो को जो जानकारी दी उसने हमें अभिभूत कर दिया| उनकी बाते सुनकर हमें बड़ा अचरज हो रहा था की कैसे कोई खदान इतनी गहरी हो सकती है |ये ख्याल भी हमें प्रफुल्लित कर रहा था की भारत की सबसे गहरी खदान व् दुनियां की दूसरी गहरी खदान ( चीन की कोयला खदान दुनियां की सबसे गहरी खदान है.) के प्रशासनिक अधिकारीयों के सामने हम बैठ कर बात कर रहे है लेकिन उनकी जिस बात ने हमें सबसे ज्यादा अचरज में डाल दिया था वो थी दामोदर नदी | उन लोगो के अनुसार चिनाकुड़ी खदान दामोदर नदी के नीचे है| जब खदान के अन्दर जायेगे तो वहा एक ऐसी जगह है जहा आपको लिखा मिलेगा की इस जगह के ऊपर दामोदर नदी बहती है. इंजिनियर सुरजीत बोस दीवार के ऊपर टंगे नक़्शे पर स्केल लेकर हम लोगो को बता रहे थे और हम लोग बुत बने आंखे चौड़ी कर अविश्वास के साथ देख रहे थे | मैनेजर साहब को हम लोगो की मनोस्थिति का पता चल गया .उन्होंने हम लोगो से कहा की आप खदान के नीचे चलकर स्वयं देख लीजिये | हम लोग आनन -फानन में तैयार हो गए .उनके सहयोगी ने हम लोगो को सफ़ेद कोट पहना दिया ,जिसे पहन कर हम सब डाक्टरों की टीम लग रहे थे जो किसी आपरेशन के लिए तैयार खड़ी थी .हमने मेनेजर जी से पूछा की ये सफ़ेद कोट क्यों पहना जाता है.इस पर मैनेजर जी ने जवाब दिया ,"अँधेरे में नजर आने के लिए "|मन में ढेरो उत्सुकता समाये हम लोग खदान की तरफ बढ़ रहे थे .सुरजीत बोस जी बराबर हम सबको मशीनों के बारे में समझा रहे थे| किन्तु हम सब अपनी आदत से लाचार फोटो खीचने में ज्यादा मगन थे |इसका कारण ,एक अनजानी दुनियां से सामना जो हम लोगो के लिए एकदम अनोखी और रहस्योभरी थी | हम जानते थे की हो सकता है ये हमारे लिए पहली और आखरी यात्रा बन जाये.अतः हम किसी भी अवसर और कोने को अछूता नहीं छोड़ना चाहते थे .
| चिनाकुड़ी खदान की लिफ्ट के सामने |
| लिफ्ट के अन्दर जाने से पहले . |
जब चित्र खीचने की प्रक्रिया ख़त्म हो गयी तो हम लोग लिफ्ट की तरफ बढे .अब बारी थी अपनी योजना को अंजाम देने की | यानि की दो हजार फीट नीचे जाने की | नीचे जाने से पहले मोबाईल ,शाल ,बैग ,कैमरा सब ले लिया गया था | बैटरी वाली बैल्ट के साथ हम लोगो को टॉर्च वाला हेलमेट पहना दिया गया .ये देखकर हमें अमिताभ बच्चन की फिल्म 'कालापत्थर 'याद आ गयी | सच भी यही था की उस फिल्म के आलावा हमारे पास कोयले खदान का कोई अनुभव था ही नहीं | इसीलिए जब हमसे पूछा गया की आप खदान में जाएगी तब एक सेकेण्ड के लिए मन में विचार आया की उस अँधेरे कुए में जाना क्या उचित होगा.किन्तु अगले ही पल मन में आया की सैकड़ो मजदूर खदान के अन्दर काम करते है ,मैनेजर ,इंजीनियर सभी तो इसके अन्दर जाते है फिर हम क्यों नहीं जा सकते.बस इसी विचार ने हमें आगे जाने के लिए प्रेरित किया . अब हम लोग अपने आधुनिक हथियारों( कैमरे,मोबाईल) से दूर ब्लैक होल की तरफ अग्रसर हो रहे थे | लिफ्ट को देखकर ही संदेह होने लगा की ये हम लोगो का भार उठाने में सक्षम होगी भी या नहीं .पुराने ज़माने की लोहे की लिफ्ट जिसके दोनों सिरे जंजीर से बंधे हुए थे .ऊपर पकड़ने के लिए एक राड़ थी| सबकुल मिला कर हम आठ लोग थे .लिफ्ट में भी आठ लोगो के ही जाने की स्वीकृति थी. चूँकि हम लोग आपस में बात कर रहे थे इसलिए गहराई का अंदाजा भी पता नहीं चल रहा था | तभी ट्राली चालक ने फोन द्वारा नीचे के आपरेटर से संपर्क किया ,संपर्क के साथ ही दो बार घंटी टन -टन की आवाज के साथ बजी जिसका मतलब सिग्नल ओके. है. आपरेटर ने जोर से कहा सावधान ,सावधान की आवाज के साथ ही खटाक की आवाज हुयी और ट्राली नीचे की ओर चल दी .जैसे ही ट्राली नीचे की ओर तेजी से चली ,मन आशंकित हो उठा ,क्योकि अब हम लोग बाहर की दुनियां से कट चुके थे और एक अनजानी दुनियां की तरफ अग्रसर हो रहे थे .चारो तरफ काली -काली दीवारे उन पर रिसता हुआ पानी , ठंडक हमे महसूस करा रहे थे की हम लोग पाताल लोक की दमघोटू यात्रा पर निकल चुके है.|मन एक अनजाने भय से ग्रसित होने लगा ,किन्तु इससे पहले हमारे दिमाग में कुछ नए डरावने विचार आते दो सेकेण्ड के अन्दर हम लोग दो हजार फीट नीचे उतर चुके थे | वहाँ हम लोगो की प्रतीक्षा में रत कर्मचारी ने आकर हमलोगों को पहले सावधान किया फिर उस ट्राली से बाहर निकाला .उस जगह हलकी पीली रौशनी थी | उसी रौशनी में हम लोग आगे बढे ,कुछ कदम आगे जाकर हमें एक छोटी सी ट्राली मिली | उस कर्मचारी ने हमलोगों को ट्राली में बैठा दिया तथा साथ ही निर्देश दिया की आप लोग अपने शरीर का कोई भी हिस्सा ट्राली से बाहर न निकाले अन्यथा दुर्घटना हो सकती है | मैनेजर ,व् इंजिनीयर दोनों ही हम लोगो को उस अँधेरी गुफा के बारे में समझाते जा रहे थे .उस गुफा में आक्सीजन के लिए पाइप लगे थे जिनसे वहा पर कार्य करने वाले कर्मचारियों को साँस लेने में सुविधा हो हो सके | दूसरी तरफ उस अँधेरी भयावह गुफा के रिसते हुए पानी को निकालने के लिए भी पाइप लगाये गए थे . ट्राली चल रही थी और हम लोग देख रहे थे की कैसे जगह - जगह पानी दीवारों से निकल रहा है ,कही धीमा तो कही हल्का तेज ,जैसे की पतला झरना गिर रहा हो .दीवारों पर रौशनी के लिए चूने की पुताई की गयी थी | बहुत सी जगह ऊपर की छत को सहारा देने के लिए लकड़ी के मोटे -मोटे खम्बो का सहारा लिया गया था . हम जैसे -जैसे अन्दर की तरफ बढ़ रहे थे ठंडक भी बढती जा रही थी. उस ठंडक का असर कानों पर भी पड़ने लगा और कान सुन्न पड़ने लगे .तभी ट्राली चालक ने एक जगह ट्राली रोकी और कहा की आप लोग अपने हेलमेट की रौशनी बंद कीजिये .हम लोग सब अच्छे बच्चों की तरह लाइट बंद कर के बैठ गए .उस अँधेरे गृह में जंहा अपना हाथ भी नजर न आ रहा हो वहा बिना रौशनी के दो चार पल गुजारना किसी कड़ी सजा से कम नहीं था | हम सभी की सांसे हलक में अटकी हुयी थी की तभी अगले पल आदेश हुआ की अब आप रौशनी चालू रख सकते है .हमने उत्सुकतावश पूछा की आपने रौशनी बंद क्यों करवाई थी | इस पर जवाब मिला की आप लोगो को बताने के लिए की यंहा बिना रौशनी के क्या स्थिति होती है .हमने मन ही मन कहा की जब रौशनी है तब तो ये सुरंग इतनी दमघोंटू है बिना रौशनी के कोई कैसे जी सकता है |लेकिन उस पल हमें ये अनुभव अवश्य हो रहा था की अगर किसी को मारना हो तो यंहा छोड़ दिया जाये और उससे सिर्फ इतना कह दे की अब तुम्हे खुला आसमान देखने को कभी नसीब नहीं होगा ,पक्का वो व्यक्ति पंद्रह मिनट के अन्दर ही खत्म हो जायेगा ||उस दिन हमें खुले आसमान का महत्त्व समझ में आया तब लगा की वाकई में जो वस्तु आसानी से उपलब्ध होती है उसके मूल्य का कोई अंदाजा नहीं लगाता |अब हम लोग उस जगह पर थे जंहा लिखा हुआ था की इस जगह के ऊपर दामोदर नदी बहती है |ये पढ़कर हम रोमांचित हो उठे की हम लोग जमीन के इतने नीचे है की हमारे ऊपर दामोदर नदी बह रही है और हमें इसका जरा सा भी आभास नहीं |मन किसी बच्चे की भाति आपने आप से ही प्रश्न करने लगा की अगर इसकी छत में सुराख़ हो जाये तो दामोदर नदी का पानी तो पूरी खदान को ही बहा ले जायेगा |दामोदर नदी के बीचोबीच पहुँच कर ट्राली रुकवाई गयी और बताया गया की इस खदान का काफी हिस्सा दामोदर नदी के उस पार और इस पार है | इस खदान का कुछ हिस्सा पुरुलिया में भी है.बातो के दौरान हम लोग छः किलोमीटर ( 6 km.)अन्दर पहुँच गए थे .पूरी खदान में ट्राली चलाने के लिए लोहे की पटरी बनी हुयी थी इन्ही पटरियों पर कोयले की ढुलाई छोटी -छोटी ट्रालियों द्वारा होती है.एक जगह ट्राली रोक कर हम लोगो को नीचे उतरने के लिए कहा गया .वहा उतरकर हम लोग आगे गए जंहा पर हमने दो रास्ते देखे ,दोनों ही रास्ते पतली सुरंग नुमा थे ,एक पतले रास्ते पर ट्राली के जाने के लिए ट्रैक बना हुआ था दूसरी तरफ सिर्फ रास्ता ही था .हमने पूछा ये दोनों रास्ते किस लिए है .मैनेजर ने जवाब दिया की ट्राली वाले रास्ते में कोयले की खुदाई चल रही है ,और दूसरा वाला रास्ता बंद कर दिया गया है. क्योकि वंहा कोयला अब खोदने लायक नहीं बचा है. हमारे पूछने पर की यहाँ कितना कोयला है ,मैनेजर जी ने बताया की अभी ७२ मिलियन टन (72 million ton ) कोयला निकालना बाकी है.
अब तक हम काफी अन्दर आ चुके थे ,हमें लगा की कही ऐसा न हो की इंजीनयर साहब हमें खुदाई वाली जगह दिखाने के लिए फिर से ट्राली में बैठने के लिए न कह दे , अतः हम तुरंत वापस जाने वाले रास्ते पर आ गए .हमारे साथ के लोग भी वापस जाने के मूड में ही थे | इंजीनियर जी ने बताया की इस खदान में दो ट्राली वाली लिफ्ट है ,अगर एक ख़राब हो जाये तो दूसरी काम करती रहती है .इस खदान में पाँच वर्षो से एक भी दुर्घटना नहीं घटी | यंहा ५५० ( 550 ) श्रमिक दैनिक काम करते है.आदि -आदि .लेकिन सच ये था की अब हमारी दिलचस्पी उस खदान के बारे में जानकारी एकत्र करने में कम बल्कि दो हजार फीट नीचे जमीन के अनछुए अनुभवों को बाटने में ज्यादा थी | वैसे भी हमारी यात्रा अब समाप्ति की ओर थी और हमारे पास था अनुभवों का बेहतरीन खजाना जिसे लुटाने के लिए हमें खुले आसमान की अत्यधिक आवश्यकता थी .
| आभार स्वरूप एक चित्र चिनाकुड़ी खदान के मैनेजर , इंजीनियर व् 'डी वेक ' टीम के साथ . |
अवैध खदान
जिन खदानों को सरकार बंद करा देती है उन्ही में अवैध खुदाई होती है वंहा कोई भी नहीं जा सकता क्योकि उन खदानों के पास माफियाओ के गुर्गे निरंतर निगरानी करते रहते है | ये खदाने सुरक्षा के दृष्टिकोण से बिलकुल सही नहीं होती क्योकि उन खदानों में जरूरतमंद जिन्हें काम की बहुत आवश्यकता होती है वही काम करते है | इनमे काम करने वालो को पैसा भी अच्छा मिलता है | उन खदानों में काम करने वालों का कहना है की मारना तो ऐसे भी है तो फिर क्यों न काम करके मरे कमसेकम परिवार का पेट तो भरेगा | ये खदान बाहर से पतली सुरंग जैसी होती है जिनका मुख्य द्वार इतना छोटा होता है की उसमे जाने के लिए इन्सान को झुक कर जाना पड़े .मजदूर इनमे मोमबत्ती के सहारे जाते है ,यंहा आक्सीजन की कोई व्यवस्था नहीं होती ,कितनी बार जहरीली गैस निकलने से मजदूर मर जाते है या कभी आग लग जाती है या अचानक पानी की तेज धार फूट पड़ने से मजदूर हादसों के शिकार हो जाते है.इन खदानों से हादसे के दौरान दुर्घटनाग्रस्त लोगो को निकालने के लिए दूसरे दरवाजे की कोई व्यवस्था नहीं होती.ये बहुत ही खतरनाक होती है |सबसे बड़ी बात की अक्सर अवैध खदानों में होने वाले हादसों की खबर प्रेस में छपने नहीं दी जाती है या तो प्रेस को पैसा देकर चुप करा दिया जाता है या डरा -धमका के उस जगह से दूर रखा जाता है. जिस परिवार का व्यक्ति इस दुर्घटना में मारा जाता है उसे पैसे के बल पर शांत रखा जाता है .चूँकि मारा जाने वाला व्यक्ति अवैध खदान का कर्मचारी होता है तो परिवार वाले भी पुलिस की जाँच के डर से चुप रह जाते है.
Monday, 14 November 2011
'NARAYNI DEVI' BALUGAN (DIST.KHURDA ) ORISSA
नारायणी देवी मंदिर
चिल्का लेक से लगभग २२ ( 22 km ) किलोमीटर की दूरी पर नारायणी देवी मंदिर है.ये मंदिर घने जंगल में है ,यहाँ जंगली जानवरों का बहुत भय रहता है.इस मंदिर की चढ़ाई बहुत ज्यादा नहीं है लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं कि आप कुछ एक सीढिया चढ़ ने कि कल्पना कर ले . ऊंचाई है लेकिन पहाड़ो में बने मंदिर से काफी कम ऊंचाई पर है. सीढिया चढ़ के सबसे पहले पानी का छोटा सा कुंड आता है ,इसमें पानी की पतली धारा बराबर गिरती रहती है .वंहा के लोगो का कहना है की किसी को पता नहीं ये पानी कहा से आता है और कहा जाता है.
| कुंड जिसमें निरंतर जल की धारा गिरती रहती है, ये कहा से आती है और कहा जाती है किसी को इसका पता नहीं . |
अन्दर में मंदिर ज्यादा बड़ा नही है ,मूर्ति भी मझोले कद की है.बाकि के मंदिरों की तरह यहाँ भी पण्डे चढ़ावा में ज्यादा दिलचस्पी लेते है व् प्रत्येक आने वाले भक्त को छोटी -छोटी जगह भी दक्षिणा देने के लिए कहते है .लेकिन उन लोगो की मांग हमें समझ में आई वो इसलिए क्योकि उस जंगल के मंदिर में जाने वाले बहुत ही कम लोग होते है ,इसलिए उनकी आमदनी भी कम ही होती है.
| शकुन त्रिवेदी ,नारायणी देवी मंदिर के प्रवेश द्वार के सामने |
| मंदिर से वापस आने के लिए पहाड़ो को काट कर बनाया गया मार्ग. |
| नारायणी देवी मंदिर के जंगल में एक लंगूर बन्दर पानी पीता हुआ . |
| नारायणी देवी मंदिर में बत्तख |
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