Wednesday, 14 May 2025
Monday, 4 May 2020
Shakun Trivedi : गंगटोक जाये और नाथुला न जाये....
Shakun Trivedi : गंगटोक जाये और नाथुला न जाये....: २७ मई से ४जून 2019 गैंगटोक जाएं और नाथुला न जाए तो समझिए आपका जाना व्यर्थ, इसलिए नहीं कि नाथुला कोई तीर्थ स्थल है वरन इ...
गंगटोक जाये और नाथुला न जाये....
२७ मई से ४जून 2019
गैंगटोक जाएं और नाथुला न जाए तो समझिए आपका जाना व्यर्थ, इसलिए नहीं कि नाथुला कोई तीर्थ स्थल है वरन इसलिए की नाथुला लगभग 15,000 की ऊंचाइयों पर स्थित इंडो - चाइना बार्डर है , जहां भारतीय सैनिक बारहों महीने सर्दी, गर्मी , बरसात में हमारे देश को चाइना की बुरी नजर से बचाते है , उनकी साजिशों को नाकाम करते है, कड़कड़ाती ठंड में भी बंकरों में बैठ कर गश्त देते है। और सबसे बड़ी बात कि वहां का तापमान हमेशा माई नेस पर रहता है और खबरों में छाया रहने वाला अत्यधिक विवादित स्थल डोकलाम नाथुला से कुछ किलोमीटर की दूरी पर है।
हम लोगो ने भी जब गंगटोक घूमने की योजना बनाई तो नाथुला को सबसे पहले प्राथमिकता दी। उसके बाद जोर - शोर से गूगल पर सीट आरक्षित कराने के लिए फास्ट ट्रेनों की वर्तमान स्थिति पर युद्ध स्तर पर सर्च जारी कर दी। चूंकि मई महीने का अंतिम चरण और बच्चों के स्कूल बंद होने के कारण सारी ट्रेनें पहले से ही आरक्षित हो चुकी थी। एक स्पेशल ट्रेन जो रात में जलपाई गुड़ी पहुंचती उसमे सी टे खाली थी परंतु यहां समस्या थी अपने दो प्यारे सदस्यों भोली और दृष्टा को ले जाने की क्योंकि उन्हें किसी के भरोसे छोड़ कर जा नहीं सकते थे और ट्रेन में ले जाना उनके लिए बहुत कष्टकारी होता। अतः हम लोगों ने टेंपो ट्रैवलर कोलकाता से गंगटोक जाने और गंगटोक से कोलकाता वापसी तक के लिए बुक कर ली। अब हमारी 13 लोगो की ब्रिगेड जिसमें भोली व दृष्टा ( लेब्रा ) भी थी 28 मई को दिन के ठीक 12 बजे सवार होकर चल दी। खराब रास्ता और प्रचंड गर्मी ने ऐसी की हवा निकाल दी। जैसे तैसे दूसरे दिन प्रातः 5 बजे हम लोग सिलीगुड़ी पहुंच गए। वहां पहुंच कर राहत की सांस ली कि चलो अब अपने लक्ष्य से ज्यादा दूर नहीं। धूल धूसरित उनिंदा सिलीगुड़ी छोड़कर जैसे ही गंगटोक के रास्ते को पकड़ा हरी तिमा लिए हुए पहाड़ों ने स्वागत किया। गंगटोक मार्ग के प्रवेश द्वार के पास ही भ्रामरी देवी ( त्रिसोत्रा) मंदिर है और ये 52 शक्तिपीठों में से एक है। किन्तु प्रातः 5.30 मंदिर खुलने का समय न होने के कारण हम लोग दर्शन से वंचित हो गए। ये पीड़ा हृदय में जगह बनाती की उससे पहले लंबी लंबी उछाल मारती तीस्ता नदी के ऊपर बना बहुत ही आकर्षक कोरोनेशन ब्रिज पड़ा इसी ब्रिज के बगल से गंगटोक जाने का रास्ता है ब्रिज के ऊपर से असम जाने का मार्ग है। अब तक हम लोगो की थकान पूर्ण रूप से गायब हो चुकी थी। तीस्ता नदी उछाले मारती हुई अब हमारे साथ साथ चल रही थी। पहाड़ों का मनोरम स्वरूप और तीस्ता की अठखेलियां हम लोगो के आकर्षण का केंद्र थी। समुद्री तल से लगभग 6, 000( छः हजार ) फीट की ऊंचाई पर स्थित गंगटोक पहुंचने में हम लोगो को लगभग 5 ( पांच) घंटे लग गए परन्तु प्रकृति के दिव्य रूप ने हम सभी को अभिभूत कर रखा था।
गंगटोक में बाहर की गाड़ियां शहर के अंदर नहीं जा सकती उन्हें बाहर की गाड़ियों के लिए बनाए गए चार तल्ले के पार्किंग जोन में अपनी गाड़ी खड़ी करनी होती है। हम लोगो ने वहां से टैक्सी पकड़ी और मुख्य मार्केट में स्थित होटल डेंजोंग में आ गए ये तीन बड़े कमरों एक हॉल और किचेन के साथ सूट था। जिसे आर के हांडा जी ( सिक्किम के पूर्व डायरेक्टर जनरल आफ पुलिस) ने मेरे आग्रह पर की छुट्टियों के सीजन में कोई भी होटल हमे अपने यहां कुत्तों को देखकर जगह नहीं देगा। व्यवस्था करवाई थी। होटल की बड़ी बड़ी खिड़कियों से ऊंचे ऊंचे पहाड़ों की सुंदरता अद्भुत दिखती थी।
गंगटोक के मालरोड का बहुत नाम है, अतः शाम के समय हम लोगो ने माल रोड पर जाकर खरीददारी करने की सोची और बेटों ने नाथुला जाने के लिए ट्रैवल एजेंटों से बात करने की। परन्तु इतना तेज पानी बरसने लगा कि खरीददारी की सारी योजना तीव्र गति से बरसते पानी में बह गई। बेटों ने बताया कि ट्रैवल एजेंट बता रहा है कि भोली ,दृष्टा कुत्ते होने के कारण नहीं जा सकते। और नाथुला परमिट के लिए 3हजार पर गाड़ी का लेगा। एक बार फिर से नाथुला योजना धूमिल होती दिखने लगी। हमने फिर से हांडा जी से बात की और समस्या बताई उन्होंने कोलकाता में बैठ कर ही हमारी समस्या का निदान कर दिया। और 30 - 31 मई गंगटोक घूमने के बाद 1 जून को हम लोग नाथुला के लिए रवाना हो गए। हमें बहुत ही खुशी हो रही थी कि ऐसे दुर्गम स्थल पर मेरे प्यारे बच्चे भोली दृष्टा मेरे साथ है। जाने वालों की काफी भीड़ थी लेकिन उनमें से अधिकतर छंगू लेक और बाबा मंदिर जाने वालों की थी। अभी हम लोग जी भर कर खुश भी नहीं हो पाए कि पता चला कि इस तंग रास्ते में एक गाड़ी के दुर्घटना ग्रस्त हो जाने के कारण लंबा जाम लग गया है। वैसे भी पहाड़ी रास्ते में अक्सर हिम स्खलन होने के चलते जाम लग जाता है।
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| जाम में अटकी गाड़ियों की लम्बी लाइन |
गंगटोक में भुट्टे ( Maize n popcorn ) पॉपकॉर्न बहुत मिलते है. टाइम पास करने के लिए सभी लोग इन्हे खरीद रहे थे। हम लोग भी देर होती देख गाड़ी से उतर कर भोली, दृष्टा को घुमाने लगे। उन्हें देखने के लिए उनके साथ फोटो खींच वाने के लिए कई बच्चे व बड़े उनके पास आ गए। अब तक जाम खुल चुका था सभी गाड़ी में बैठ कर उत्साहित मन के साथ जल्दी से जल्दी नाथुला पहुंचना चाह रहे थे। नाथुला से लगभग कुछ किलोमीटर पहले ही छोटी छोटी दुकानें थी जिनमें मैगी, मोमो, ब्रेड आमलेट आदि मिल रहा था साथ ही 100 रुपए प्रति भाड़े पर ऊनी कपड़े एवम् जूते। उस छोटी सी दुकान की खिड़की से ऊंचे - ऊंचे पहाड़ नजर आ रहे थे और एक पहाड़ी से गिरने वाला झरना अत्यंत मोहक लग रहा था हम लोगो ने बिना समय गंवाए उस सुंदरता को अपने कैमरे के हवाले कर दिया।
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| नाथुला के रास्ते में पड़ने वाला बाजार |
वहां से निकल कर सीधे हम लोग नाथुला पहुंचे। नाथुला पहुंचते ही मयनेस डिग्री टेंप्रेचर ने हम लोगों का स्वागत किया सर भारी लगने लगा लेकिन उस एहसास को हमने अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया क्योंकि हम जैसा सोचते है वैसा ही हमारा शरीर अनुभव करने लगता है। अब हम सभी लोग इत्मीनान के साथ उस जगह जा रहे थे जहां भारत और चाइना गेट आमने सामने है और उसे देखने के लिए वहां पहुंचने वाला प्रत्येक पर्यटक बेताब रहता है। रास्ते में बहुत सारे पर्यटक चढ़ाई चढ़ रहे थे अधिकतर लोग कपूर रुमाल में लेकर बार - बार उसे सूंघते ताकि आक्सीजन की कमी शरीर में न हो जबकि कपूर सूंघने से कुछ समय के लिए राहत मिल जाएगी परन्तु बाद में ये शरीर को नुक्सान पहुंचाता है। बहुत से पर्यटकों के चेहरे पर पहाड़ों की ऊंचाई का डर नजर आ रहा था। तो कुछ कम उम्र के युवा बरफ में उतर कर फोटो खिचा रहे थे। गेट के पास पहुंचने पर देखा कि सारे पर्यटक भारतीय है। ये देखकर हमसे रहा नहीं गया और हमने वहां खड़े फौजी से सवाल किया कि चाईनीज पर्यटक क्यों नहीं दिख रहे है इस पर उसने जवाब दिया कि चाइना के निवासी बहुत कम नाथुला देखने आते है। लगभग 25 मिनट रुकने के बाद हम लोगो ने वापसी की तो देखा एक फौजी नाथुला घूमने वालों को सिग्नेचर किए हुए सर्टिफिकेट रुपए 70 लेकर दे रहा हैं और 250 का जय जवान वाला कप जिस पर नाथुला गेट की पिक्चर छपी हुई थी। हम लोगो ने भी सर्टिफिकेट और कप लिया और केंटीन में काफी पीने बैठ गए। वहां हमारी मुलाकात एक लेफ्टिनेंट से हुई ,उसने बताया कि जब उसकी पोस्टिंग यहां हुई थी तो एक महीने तक दोनों समय मैगी खाकर काम चलाया। फोन काम नहीं करता किसी घरवाले से बात नहीं, टीवी, रेडियो कुछ भी नहीं मै लगभग पागल हो गया था। उससे डोकलाम विवाद के बारे में पूछने पर उसने कहां कि ये चीनी लोग बहुत बदमाश होते है जब तक इन्हे सभ्यता दिखाओ ये सर पर चढ़ते है जब हम लोगो ने इन्हे पीट दिया तो सुधर गए। हमने उससे दूसरा सवाल किया कि तुम लेफ्टिनेंट हो और भी आर्मी अफसर होंगे। उसने जवाब दिया कि हां किन्तु यहां किसी को भी अपने रैंक को लगाकर रहने की इजाजत नहीं है। फिर पूछने पर की इस सुनसान स्थल पर मन लगाने की कुछ तो व्यवस्था की होगी तो उसने कहा हम लोग ऐसे ही खुश रहते है। हमने सवाल किया कि यहां सैकड़ों पर्यटक आते है वे कुछ न कुछ सवाल भी करते होंगे कुछ ऐसे सवाल बताइए जो खीझ उत्पन्न करते हो। इस पर वो बोला आने वाले पर्यटक अधिकतर पूछते है कि चाइना गेट पर इतने झंडे लगे है जबकि भारत के गेट पर एक भी नहीं? अब उन्हें कौन समझाए कि चाइना का द्वार भारत के द्वार से कुछ उचाई पर है और हम लोग चाइना के नीचे । अपने झंडे लगाकर क्या अपने को चाइना से छोटा बताएंगे। कभी कोई पूछेगा अच्छा बताइए लेह लद्दाख की ऊंचाई कितनी है ? अब उन्हें कौन समझाए कि हम गूगल नहीं है, तुम हमसे नाथुला के बारे में पूछो। ऐसे सैकड़ों प्रश्न किए जाते है जिनका कोई सिर पैर नहीं होता।
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| नाथुला में पृकृति के बीच फोटो सेशन करवाते हुए |
जैसे ही उतरने के लिए आगे बढ़े तो पूछा आप लोगों ने यहां की फोटो नहीं खींची इस पर हमने जवाब दिया की आपके फौजियों ने ऊपर कैमरा लाने के लिए मना किया था। ये सुनकर वो हंसने लगे और बोले हम लोग तो मना करेगे कैमरा भी छीनेगे क्योंकि आप लोग यहां की फोटो सोशल मीडिया में पोस्ट कर देते हो जिसकी यहां सख्ती से मनाही है।लेकिन बाद में कैमरा दे देते है। उसने अपने मोबाइल से हम लोगो की कई फोटो खींची सेल्फी ली और मेरा नंबर भी ताकि वो हमें व्हाट्सअप पर भेज सके। हम लोगो ने सोचा कि इसने हम लोगो की फोटो खींच कर हम सबको पोपट बनाया है किन्तु खुशी तब हुई जब उसने 15 दिन बाद हमें पिक्स भेज दी। एक बात जो हमें अच्छी लगी कि वो हमसे कुछ ज्यादा ही प्रभावित हो गया था इस लिए मुझे मां कह कर संबोधित कर रहा था और हमें एक फौजी बेटे की मां बनने का गर्व महसूस हो रहा था।
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| रास्ते में मनोरंजक इश्तिहार |
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| भोली -दृष्टा नाथुला में |
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| एक पारिवारिक छवि वनस्पति रहित नाथूला दर्रा 15000 फीट की ऊंचाई पर |
Saturday, 2 May 2020
Shakun Trivedi : भारत गूंगा नहीं
Shakun Trivedi : भारत गूंगा नहीं: 27 अगस्त 2019 के टेलीग्राफ में एक छोटी सी खबर " अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप का वक्तव्य " ही ( नरेंद्र मोदी ) एक्चुअली स्पीक्स...
Shakun Trivedi : भारत गूंगा नहीं
Shakun Trivedi : भारत गूंगा नहीं: 27 अगस्त 2019 के टेलीग्राफ में एक छोटी सी खबर " अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप का वक्तव्य " ही ( नरेंद्र मोदी ) एक्चुअली स्पीक्स...
भारत गूंगा नहीं
27 अगस्त 2019 के टेलीग्राफ में एक छोटी सी खबर " अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप का वक्तव्य " ही ( नरेंद्र मोदी ) एक्चुअली स्पीक्स वेरी गुड इंग्लिश, ही जस्ट डस नॉट वांट टू टॉक" पढ़ी तो बहुत ही खुशी हुई क्योंकि मोदी को हिंदी में बोलते देख अक्सर अंग्रेजी प्रेमी मोदी के अंग्रेजी न जानने पर सवाल उठाते थे, हिंदी में मोदी के संबोधन, उद्बोधन को मोदी की मज़बूरी बताते थे और उनका अंग्रेजी में ज्ञान न होना उनके अपूर्ण व्यक्तित्व की पहचान बताते थे। लेकिन वे तथाकथित अंग्रेज ये भूल जाते है की जिस अंग्रेजी को वो स्मार्टनेस की निशानी समझ खुद को हाई - फाई समझ कर गौरवान्वित हो रहे है वो उधार ली हुई भाषा है ना कि आपको अपने देश की जड़ों से जोड़ने वाली, संस्कृति से परिचय कराने वाली, अपने देश का मान - सम्मान बढ़ाने वाली भाषा है। यूके में रहने वाली मेरी मित्र ने बताया था कि जब वो वहां गई थी तब उनके बच्चे छोटे थे और उन्हें अच्छी अंग्रेजी सिखाने के लिए वे घर में अंग्रेजी बोलते थे एक दिन उनकी बेटी स्कूल से बहुत नाराज़ अाई और बोली "ममा प्रत्येक देश की अपनी भाषा, साहित्य, संस्कृति होती है परन्तु हम भारतीयों के पास अपना कुछ भी नहीं है हम सपेरों के देश के है क्या यही हमारी पहचान है?" उसके बाद वहां रहने वाले भारतीयों ने ये निर्णय लिया कि हम लोग छुट्टी वाले दिन मंदिरों में अपने बच्चो को भाषा और तीज - त्योहार की जानकारी देंगे उन्हें वर्ष में एक बार भारत लाएंगे और उनके देश से मिलवाएंगे।
भाषा के प्रति सम्मान, समर्पण देखना है तो छोटे से देश नेपाल को देख कर सीखना चाहिए जहां अंग्रेजी सीखी जाती है व्यवसाय करने के लिए किन्तु आपस में बोलने के लिए, साहित्य लिखने के लिए, अपनी मातृ भाषा नेपाली को ही प्राथमिकता दी जाती है। सीखना है तो जर्मनी, जापान, चाइना से सीखना चाहिए जिन्होंने अंग्रेजी को महत्व न देकर अपनी मातृ भाषा को महत्व दिया। लेकिन हम देशवासियों की मज़बूरी की यहां रोजगार अंग्रेजी जानने वालों को मिलते है, मातृ भाषा में महारथ हासिल करने वाले को पिछड़ा के टैग से नवाजा जाता है। ये कहना कदापि गलत नहीं होगा कि आजादी के दशकों बाद भी हमारे राजनेताओं ने भाषा के आधार पर कभी भारत को एक नहीं होने दिया। जबकि गांधी जी ने स्वयं कहा था कि जिस देश की कोई भाषा नहीं होती वो देश गूंगा होता है। दक्षिण भारत ने भी सदैव हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाए जाने का विरोध किया यहां तक कि तमिल वासियों ने 2019 की नई शिक्षा नीति जिसमें हिंदी को बढ़ावा देने की बात है उसका विरोध किया और अंत में सर्वोच्च न्यायालय को कहना पड़ा कि हिंदी को थोपे न। संवैधानिक दृष्टि से हिंदी राष्ट्र भाषा नहीं बन पा रही है ये दुख की बात है किन्तु मोदी जी ने जिस तरह से हिंदी का प्रचार - प्रसार किया है उसने ये साबित कर दिया कि भारत देश गूंगा नहीं है उसके पास अपनी भाषा है। उनकी हिंदी से प्रभावित होकर बराक ओबामा जय हनुमान जी बोलने लगे, मोदी है तो मुमकिन है कि तर्ज पर " ट्रंप है तो मुमकिन है" अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने अपना स्लोगन बना लिया। ये सब देख कर, सुन कर अधिकतर लोग गर्वित महसूस करते है कि अब हिंदी को आसमान छूने से कोई नहीं रोक सकता लेकिन हिंदी से हिंग्लिश की ओर जाती भाषा पर ध्यान किसी का नहीं जा रहा है जबकि इस ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि कहीं ऐसा न हो हम जिस हिंदी को जानते है समझते है उसका मूल स्वरूप ही बदल जाए और दिल मांगे मोर और ठंडा ठंडा कूल कूल हो जाए। अतः अकेले मोदी ही नहीं हम सबको प्रयास करना होगा हिंदी के वास्तविक स्वरूप को बचा के रखने की क्योंकि - निज भाषा उन्नति अहे सब उन्नति को मूल।
Thursday, 30 April 2020
Shakun Trivedi : मोदी जी का सपना
Shakun Trivedi : मोदी जी का सपना: गैंगटॉक ( सिक्किम ) जाना हुआ , पहाड़ों की सुंदरता अकल्पनीय थी जगह -जगह पहाड़ों से बहते हुए झरने ,गहरी -गहरी खाई मन को वशीभूत करने क...
मोदी जी का सपना
गैंगटॉक ( सिक्किम ) जाना हुआ , पहाड़ों की सुंदरता अकल्पनीय थी जगह -जगह पहाड़ों से बहते हुए झरने ,गहरी -गहरी खाई मन को वशीभूत करने के लिए काफी थे किन्तु वहां की जिस बात ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया वो था वहां का नियम - कानून, वहां के लोगो का शांतिप्रिय स्वाभाव। टैक्सी चालक टैक्सी में गाने भी हल्की आवाज में सुनते ताकि किसी को परेशानी न हो । अपने शहर -गांव के प्रति समर्पण अपनी सभ्यता के प्रति निष्ठा और सबसे ज्यादा सराहनीय था वहां के लोगो द्वारा स्वछता के प्रति जुनून। वहां गंदगी फैलाना जुर्म है यहाँ तक की कोई भी कही भी गुटका -पान मसाला नहीं थूक सकता। कही भी कचरा नहीं फेक सकता। गाड़ी में बैठ कर चिप्स --बिस्किट -केक का स्वाद लेकर खाने वाले उसके रैपर या पानी की बोतलों को किसी पहाड़ या खाई में नहीं फेंक सकते। अधिकतर पर्यटक गंगटोक में नियम मान कर अपनी सज्जनता का परिचय देते है वही वे सिलीगुड़ी पहुंचते ही खुद को आजाद अनुभव कर जी भर कर कचरा फेंक ,पान -मसाले की पीक थूककर सिलीगुड़ी की सुंदरता में चार चाँद लगाना आरम्भ कर देते है। आश्चर्य तो ये देखकर होता है की अधिकतर पर्यटक शिक्षित होते है ,बड़े व्यवसायी या अफसर होते है लेकिन वे स्वच्छता जैसी बातों को महत्व क्यों नहीं देते । जहाँ तक गांवों की बात करे वहां के ज्यादातर लोग काम चलाऊ पढाई करते है किन्तु जिंदगी की बेसिक बातों को नजर अंदाज नहीं करते जिसमे खास कर अपने आस - पास की साफ -सफाई पर ध्यान देना। वे लोग अपने घरों को तो स्वच्छ रखते ही है बल्कि घर के सामने की गली को भी झाड़ कर साफ कर देते है ताकि रास्ता स्वच्छ दिखे। जबसे शिक्षा का स्वरुप महज डिग्री पा कर किसी ऊँचें संस्थान में नौकरी पाना हो गया है तबसे जीवन की अहम बातें गौड़ हो गयी है। ऊपर से नगरपालिका या टाउन एरिया ने सफाई की जबसे जिम्मेदारी उठा ली है तबसे प्रत्येक व्यक्ति सफाई के लिए नगर निगम कर्मचारी के ऊपर निर्भर रहने लगा है लेकिन मजे की बात ये है की उस कर्मचारी द्वारा की गयी सफाई भी बहुतों को रास नहीं आती जिसमे महिलाये भी अपना पूरा सहयोग देती है मसलन सफाई कर्मचारी बिल्डिंग के सामने जाकर सीटी बजाते है जिसका मतलब घर का कचरा उन्हें सौप दिया जाये परन्तु बहुत से ऐसे घर होते है जिनकी महिलाएं सफाई कर्मी को कचरा नहीं देंगी किन्तु उसके जाने के कुछ मिंटो में ही घर से निकाले गए कचरे का पैकेट सड़क पर आ टपकेगा। इन सब बातों पर अगर हम गौर करे तो पाएंगे की जागरूकता होने के बावजूद भी अधिकतर लोग सफाई को गंभीरता से नहीं लेते या लोगो में सफाई के प्रति रुझान नहीं है। हमारे बुजुर्गो ने वृक्षों , नदियों , पहाड़ों को किसी न किसी रूप में धर्म से जोड़ दिया था ताकि उनकी अनदेखी न हो और न ही उनका दुरूपयोग, किन्तु पाश्चात्य संस्कृति में सराबोर लोगो को इसमें अन्धविश्वास नजर आने लगा. एक और हमारे प्रधान मंत्री मोदी जी स्वच्छता अभियान चला कर पूरे भारत के स्वरुप को बदलने की कोशिश कर रहे है दूसरी ओर अनेक टीवी चैनल पान मसाले के विज्ञापन दिखा कर युवाओं को भ्रमित कर रहे है। ऐसे विज्ञापन देख कर ये तो हर कोई समझ सकता है की बिना सरकार की सहमति के कोई भी चैनल इस तरह के बिज्ञापन नहीं दिखा सकता इसका सीधा सा मतलब है की इनसे आने वाले राजस्व का लालच ही सरकार को इन पर कठोर करवाई नहीं करने दे रहा है ठीक वैसे ही जैसे की दुकानदारों पर सख्ती कि वे पॉलीथिन में सामान न दे लेकिन पॉलीथिन बनाने वाले कारखानों पर कोई सख्ती नहीं। जनता के लिए सन्देश गंगा साफ रखे किन्तु सीवर ,टेनरी पर पूर्णतया रोक नहीं है। इन सब बिंदुओं पर ध्यान दे तो ये मानना पड़ेगा कि मोदी जी का सपना भारत को स्वच्छ रखने का तब तक पूरा नहीं हो सकता है जब तक की चैनलों द्वारा इस प्रकार के विज्ञापनों और पान मसाला, गुटका के निर्माण करताओं पर रोक नहीं लगेगी।
Tuesday, 28 April 2020
Shakun Trivedi : Mahakumbh ki yatra . 2013
Shakun Trivedi : Mahakumbh ki yatra .: महाकुम्भ की यात्रा हमें 'भारतीय बाल कल्याण संस्थान कानपूर' की तरफ से ५३ वें सम्मान समारोह 2013 में हम लोगो को शामिल ह...
Shakun Trivedi : ठहरी हुई जिंदगी
Shakun Trivedi : ठहरी हुई जिंदगी: " ये लो चाय, हम जा रहे है।" पतिदेव की प्रातः कालीन बेला की मधुर नींद एक झटके में ही खुल गई बोले - " कहां जा ...
ठहरी हुई जिंदगी
"ये लो चाय, हम जा रहे है।" पतिदेव की प्रातः कालीन बेला की मधुर नींद एक झटके में ही खुल गई बोले - " कहां जा रही हो ?" हमने उत्तर दिया - " बाजार सब्जी लेने ....। " पागल हो गई हो ! मनु - गब्बू (बेटे) को भेज दो वे ले आयेगे। हमने बात अनसुनी की और निकल गए। हम जानते है कि बेटों को जितना लिख कर देंगे वे उतना ही लायेगे जब की हम बाजार में क्या - क्या है और क्या हमारी जरूरत है उस हिसाब से लायेगे, बहुत बार जो हमे भी याद नहीं होता दुकान में देखकर याद आ जाता है। दूसरी बात लॉक डाउन के दौरान अपने ही घर में नजरबंद हम उस पिंजरे के पंछी की मानिंद हो गए थे जो रोज सुबह - शाम छत पर जा कर खुला आकाश देखता तो अवश्य था किन्तु उड़ नहीं पा रहा था। तीसरी बात जो हम जानना चाह रहे थे कि बाजार में लॉक डाउन का कितना असर है। सेंट्रल एवेन्यू चांदनी मेट्रो वाला रास्ता लगभग सुनसान था। सफाईकर्मी रास्ते की सफाई करते हुए दिखाई दे रहे। बहू बाजार की तरफ आगे बढ़े तो फुटपाथ पर डेरा जमाए लोग दिखे सभी एक निश्चित दूरी बनाए, मास्क लगाए बात कर रहे थे यहां तक कि महिलाएं भी नियम का पालन कर रही थी। रास्ते में जो भी स्त्री - पुरुष दिख रहे थे। वो अपने हाथों में घर की आवश्यकतानुसार वस्तुओं को लिए ही दिखे। सब्जी वाले इक्का - दुक्का ही मास्क लगाए दिखे। एक सब्जी वाले से हमने सब्जी लेनी शुरू की, देखा उसकी पत्नी सब्जी देने में मदद कर रही थी। हमने उससे पूछा कि - तुम लोग मास्क नहीं लगाए हो तुम्हे कोरो ना से डर नहीं लगता? वो इससे पहले जवाब देती तभी थोड़ी दूर पर खड़ी महिला बोल पड़ी, " ऊपर वाले पर हमको भरोसा है, कब तक डर कर हम लोग जियेगे । सब्जी वाली ने भी मधुर मुस्कान के साथ उस महिला की बात का समर्थन किया । बातों का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए हमने पूछा, - कितने बजे सब्जी लेंने जाती हो, उसने जवाब दिया तीन बजे रात में हम लोग सियालदाह जाते है सब्जी लाने के लिए। हमने आश्चर्यमिश्रित स्वर में दुबारा प्रश्न किया इतनी जल्दी क्यों ? इस पर उसने बताया बहुत भींड होती है इसलिए। मेरा अब अगला प्रश्न था - यहां बाजार में कितने बजे तक रहती हो ? उसका जवाब था साढ़े बारह बजे तक। ये सुनकर हमें विस्मय हुआ क्योंकि बाजार सबेरे 6 बजे से नौ बजे तक ही खुले रहने की घोषणा हुई है। अभी हम उससे उसके घर - परिवार के बारे में बात कर ही रहे थे कि तभी बड़े सुपुत्र ने आकर सब्जी का बैग उठा लिया और बोला - " मम्मी आपको इस तरह बाजार नहीं आना चाहिए था ।" उसकी इस चिंता पर हमने सवाल किया क्यों ? तुमको सुबह - सुबह तुम्हारे पापा ने दौड़ा दिया न। हमने चोकोस खरीदते हुए कहा अगर हम नहीं आते तो ये तुम्हारे लिए कौन खरीदता, घर में कपूर खत्म हो गया था उसकी तो हमें याद ही नहीं थी और तो और कड़ुआ नीम तुम्हे कभी मिलता ही नहीं था।" बड़े दिनों के बाद आज हमें बाजार में फूल दिखाई दिए जबकि नवरात्रि में भी कहीं फूल नहीं दिख रहे थे। अगर हम नहीं आते तो तुम बताते ही नहीं कि फूल मिल रहे है, हमने शिकायती लहजे में उससे कहा। किराने की दुकान पर जवान - वृद्ध पंक्तियों में खड़े थे। सभी की जुबान पर कोरो ना पुराण ही था। एक युवक दूसरे से कह रहा था घर की जरूरतों के लिए तो निकलना ही पड़ेगा, डर कर कब तक घर में बैठे रहेंगे। इस पर दूसरे ने उसकी बात का समर्थन करते हुए कहां " एक दिन तो सबको ही मरना है अगर कोरो ना से मरना लिखा है तो उसी से मरेंगे। पंक्ति में खड़े एक महाशय ने राय दी कि धरती पर बहुत बोझ हो गया कुछ हल्की हो जाएगी। उन सब की बातें सुनकर अच्छा लगा क्योंकि सभी सकारात्मक ही सोच रहे थे एवम् मौत की क्रूरता जिंदगी की गंभीरता पर अश्रु नहीं बहा रहे थे। हमने अपनी इच्छानुसार समस्त जरूरत वाली वस्तुओं को लिया और आराम से बेटे की बाइक पर बैठकर घर आ गए। मन बहुत खुश था क्योंकि जो जिंदगी ठहरी हुई प्रतीत हो रही थी वो बाहर निकलने से एक उछाह भर रही थी । और जो दुनियां कोरो ना वायरस के चलते डरी हुई, थमी हुई नजर आ रही थी उसमे अभी भी जीवंतता दिख रही थी । परन्तु कोरो ना अपने रौद्र रूप में हम सबको इस क़दर भयभीत किए हुए है जिसकी वजह से स्वाभाविक जिंदगी से दूर हम सभी अपनी अपनी सांसों को सुरक्षित रखने का प्रयास कर रहे है। हां एक बात और बीच बीच में मोदी जी द्वारा दिए हुए टास्क बोझिलता को दूर करने में काफी मदद गार साबित हो रहे है।
Shakun Trivedi : कुफरी नहीं देखा तो क्या देखा
Shakun Trivedi : कुफरी नहीं देखा तो क्या देखा: " अरे यार कुछ हो गया तो लगन भी नहीं होगी।" डर के आगे जीत है, एक ने कहा तो दूसरे ने तुरंत जवाब दिया, "हमने माउंटेन ...
कुफरी नहीं देखा तो क्या देखा
डर के आगे जीत है, एक ने कहा तो दूसरे ने तुरंत जवाब दिया, "हमने माउंटेन डेउ नहीं पिया फेंटा पिया है।"
फोटो, फोटो, फोटो खींच। इस तरह की बातों के बीच बहुत से युवा ज़िप लाईन की रोमांचक यात्रा के लिए तैयार हो रहे थे। हमारी टीम, बेटे, दामाद, बहू और पतिदेव भी वर्दी पेटी से लैस होकर एक नए किन्तु खतरनाक अनुभव की ओर बढ़ रहे थे। और इस अनुभव के लिए 350 रुपए प्रति शुल्क था। दूसरी अहम बात कि इस तरह के खेल खिलाने वाले लाइसेंसी भी नहीं होते अतः खतरा ज्यादा होता है। हमने अपने पतिदेव से कहां की तुम्हारा वजन ज्यादा है तुम मत जाओ इस पर उन्होंने उत्तर दिया कि " ऊपर एक दिन सभी को जाना है, फिर डरना क्यों?" सब एक के बाद एक जा रहे थे और रोमांचित हो रहे थे। उनकी बहादुरी और रोमांच को स्थायित्व देने के लिए हमने सबकी फोटो को कैमरे में कैद कर लिया।
मेरे साथ मेरी बेटी का बच्चा था और उसे गोकार्ट का आनंद उठाना था, उसकी इच्छा पूरी करने के लिए आनन - फानन में टिकिट 500 रुपए प्रति में 7 चक्कर की ली गई और सब अपनी - अपनी गाड़ियों में बैठ गए। एक गाड़ी में बेटी और बहू बैठी जिन्हे गाड़ी चलाने का कोई अनुभव नहीं था ऊपर से हाइट कम ब्रेक, एक्सीलेटर तक पैर भी मुश्किल से पहुंच रहे थे। उन्होंने अपनी गाड़ी स्टार्ट की लेकिन वो कुछ कदम पर जाकर रुक गई परन्तु वहां तैनात लोगो में से एक ने जाकर उन्हें गाड़ी चलाने के कुछ टिप्स दिए इसके बाद दोनों ने अनुभवी चालक की तरह बिना रुके इस खेल का भरपूर आनंद उठाया।
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| फन वर्ल्ड का अपना ही मजा है |
शिमला पहुंचने के पहले ही हमारे बड़े बेटे ने घोषणा कर दी " ममी कुफरी बहुत सुंदर पर्यटक स्थल है, अगर उसे नहीं देखा तो शिमला आना व्यर्थ।" जबसे गूगल गुरु ने ज्ञान बाटना आरंभ किया है तब से ये बड़ी आम बात हो गई है कि आप अपनी जरूरत के मुताबिक होमवर्क कर के तैयार हो जाते है।
दूसरे दिन, दिन के दो बजे ( 2 पी एम्) हम लोग कुफरी के लिए रवाना हुए । कुफरी शिमला से लगभग 23 किलोमीटर की दूरी पर है चूंकि पहाड़ी रास्ता है अतः 40 से 50 मिनट में पहुंच जाते है। मेरी नजर में पहाड़ी जगह लगभग एक सामान ही होती है, अंतर होता है तो सिर्फ ऊंचाई का और गहरी खाइयों का। कुफरी की ऊंचाई समुद्र तल से लगभग 9 हजार फीट है, इतनी ऊंचाई पर पहुंच कर रोमांच होना स्वाभाविक है, लेकिन खूबसूरती के नाम पर वहां हमे सिवाय जंगल और ऊबड़ - खाबड़ रास्ते के अलावा कुछ भी नजर नहीं आ रहा था। पर्यटकों की जरूरत अनुसार मैगी, चिप्स बिस्किट, चाय, काफी की दुकानें दिख रही थी। कुफरी पहुंचते ही घोड़े वालों ने घेर लिया। पूछने पर कि ऊपर में क्या है तो उन्होंने बताया कि ऊपर महसू नाग का प्राचीन मंदिर है, एडवेंचर है और फन वर्ल्ड है। मन तो नहीं हो रहा था जाने का लेकिन फिर सोचा कि अब दुबारा इस जगह नहीं आएंगे तो क्यों न देख लिया जाए बस इसी सोच के साथ 8 घोड़े , आने - जाने का मिलाकर 500 रुपए प्रति के हिसाब से तय कर लिए गए। घोड़ों पर बैठ कर हम लोगो का काफिला ठंड से सिकुड़ता हुआ गंतव्य की ओर बढ़ चला। रास्ता कच्चा - संकरा, पथरीला बहु त ही खराब था जो हमे अमरनाथ यात्रा की याद दिला रहा था। हमने घोड़े वाले से पूछा कि कितने किलोमीटर जाना है जिसका उसने जवाब दिया 3 किलोमीटर जाना और तीन किलोमीटर आना। अगर आप एडवेंचर स्पॉट तक जाना चाहते है तो लगभग डेढ़ किलोमीटर और चलना होगा और वहां घोड़ा नहीं जाता है। ऊपर पहुंचने से पहले ही एक व्यक्ति 20 रुपए प्रति प्रवेश शुल्क ले रहा था।
ऊपर पहुंच कर घोड़े वालों ने हमें तय जगह पर उतार दिया और कहा कि आप लोग घूम कर आइए हम यहीं इंतजार करेंगे। घोड़े वाले को भूल न जाए इस लिए उससे घोड़े का नंबर ले लिया और चढ़ाई चढ़ना आरंभ किया। रास्ते में कुछ लोग याक को सजा - सवार कर खड़े थे पर्यटकों का उनके साथ फोटो सेशन करवाने के लिए । वो भी इस शर्त के साथ की फोटो आप अपने मोबाइल से लेंगे। जो लोग इच्छुक थे उन्होंने 50 रुपए प्रति पर याक के साथ फोटो खिचवाई। कुछ दूरी पर एक साधारण से टेबल पर पानी की खाली बोतले रखी थी और साथ ही राइफल लिए एक आदमी जो 20 रुपए में 6 गोली दे रहा था निशाना लगाने के लिए.
जिनपर आने - जाने वाले लोग निशाना साध कर स्वयं का मनोरंजन कर रहे थे। बहुत से स्टाल पर ऊनी कपड़े बिक रहे थे। कुछ स्टालों पर चाय ,काफी , मैगी इत्यादि उपलब्ध थी। अस्थाई शौचालय भी 10 रुपए की सेवा पर मौजूद थे। हम सभी चढ़ाई चढ़ कर थक चुके थे अतः निर्णय लिया कि बैठ कर काफ़ी पिए और सुस्ताएं। वहां देखने लायक कुछ भी नहीं था। मन ही मन कुफरी आने की योजना पर स्वयं को कोस रहे थे। तभी एक आदमी आकर बोला कि आपको एडवेंचर साईट पर गाड़ी से ले चलेंगे, 200 रुपए मात्र प्रति व्यक्ति का लगेगा। वहां फन वर्ल्ड है जिसमें अनेक प्रकार के गेम है परन्तु गो कार्ट सबसे पसंदीदा गेम है। एप्पल का बाग है, महसु नाग का प्राचीन मंदिर है आदि। फिर वही ख्याल मन में आया कि दुबारा तो आना नहीं है चलो 16 सौ ( 1600) रुपए का खून कर लिया जाए।
घूमते - घामते पांच बज गया अधिकतर पर्यटक वापस जा चुके थे स्टाल वाले तेजी से दुकान समेट रहे थे। हम लोग अभी भी घोड़े स्टैंड से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर थे और वहां तक पहुंचने के पहले काफी दूर तक चढ़ाई चढ़नी थी। घने जंगल को देखकर जंगली जानवरों से मुलाकात का डर मन में समाने लगा। तेज कदमों से चलते हुए हम लोग घोड़ों के पास पहुंच गए लेकिन वहां पर सात ही घोड़े थे मेरा घोड़ा किसी पर्यटक को छोड़ने गया था अतः वो नदारद था। अब हमारे पास उस जंगल में कुछ समय इंतजार करने के अलावा और कोई चारा न था। तभी कुछ दूरी पर खाई की तरफ हिरण दिखाई दिया जिसे देखकर हमने एक घोड़े वाले से जिसका नाम अनिल शर्मा था पूछा कि क्या यहां शेर ,भालू आदि जानवर रहते है? उसने जवाब दिया शेर मिलेंगे लेकिन भालू नहीं। अच्छा ये बताओ ऊपर कोई नहीं रहता है? उसने उत्तर दिया कि इस जगह पर कोई नहीं रहता लेकिन जहां पर एडवेंचर स्थल है उसके काफी आगे एक छोटा सा गांव है जिसमें लगभग 50 लोग रहते हैं। बातों के दौरान ही मेरा घोड़ा आ गया था उस पर सवार होने के बावजूद भी अपने सवालों का क्रम हमने बंद नहीं किया और अगला प्रश्न " वो लोग काम क्या करते है?" उसने जवाब दिया कि कुछ लोग खेती करते है तो कुछ लोग घोड़ा चलाते है। रास्ते में हमने देखा कि कुछ नौजवान 6 - 7 घोड़ों को हाकते हुए ऊपर की ओर ले जा रहे थे लेकिन वे घोड़ों पर सवार नहीं थे। इस पर हमने उत्सुकता वश पूछा कि ये पैदल क्यों चल रहे है, अपने घर घोड़े पर बैठकर जा सकते है। इस पर अनिल ( घोड़े वाले ) ने जवाब दिया कि दिन भर घोड़ा ऊपर नीचे करता है, वो थक जाता है इसलिए ये लोग नहीं बैठते। मेरा अगला सवाल था कि इन घोड़ों के रख रखाव पर खर्चा कितना आता है। इस पर जवाब मिला 300 रुपए एक दिन का खर्चा इनके खाने का है। घर पहुंच कर इनकी मालिश होगी।"
कितनी बार एक दिन में पर्यटकों को ऊपर ले जाते है ?" उसने जवाब दिया कि कमसे कम 2 बार अगर सीजन हुआ तो चार चक्कर लग जाते है। ये सुनकर हमने आश्चर्य से पूछा - थकते नहीं आप लोग? ये सुनकर वो हँसने लगा और बोला पहाड़ पर 7 - 8 किलोमीटर कोई चढ़ाई होती है। हम रोज तीन घंटे अपने घर से यहां तक आने और जाने में लगाते है 35 किलोमीटर दैनिक चलते है। फिर मेरी तरफ उन्मुख हो कर बोला " मैडम जी, आप यहां दो - तीन महीने रुक जाओ फिर देखना आप खुद को नहीं पहचान पाएगी।" हमने मन ही मन सोचा इन पहाड़ों में मेरा मन तो लगने से रहा, हमारे लिए तो मैदान ही अच्छे है जहां मानव द्वारा निर्मित विभिन्न प्रकार के आकर्षक स्थल नीरसता से दूर बच्चे -बुजुर्ग का सभी का मन लुभाने के लिए पर्याप्त है।
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| जिप लाइन की सवारी |
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| जिप लाइन मनोरंजन के साथ -साथ खतरनाक |
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| जिप लाइन एक रोमांचक यात्रा के लिए तैयार |
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| कुफरी का बाजार |
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| कुफरी की वादियों को गाड़ी में बैठकर निहारती भोली |
Thursday, 23 April 2020
Mahakumbh ki yatra .
महाकुम्भ की यात्रा
हमें 'भारतीय बाल कल्याण संस्थान कानपूर' की तरफ से ५३ वें सम्मान समारोह 2013 में हम लोगो को शामिल होने का निमंत्रण मिला ये समारोह 23 -24 फरवरी को होना था । हमारे श्रीमान मनोज त्रिवेदी के जहन में आया क्यों न हम अपनी माँ को महाकुम्भ स्नान करवा दे वैसे भी २५ फरवरी को माघी पूर्णिमा होने के कारण बड़ा स्नान था इस अवसर पर भी अनुमान था की एक करोड़ से ज्यादा की भीड़ होगी । जितने शुभचिंतक थे सब एक ही सलाह दे रहे थे की इस अवसर पर संगम में नहाना असंभव ही है । क्योंकि सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए टेम्पो,ऑटो ,गाड़िया लगभग सभी वाहनों को दस किलोमीटर की परिधि से बाहर रखा जा रहा था । ये सुनकर हमारा भी मन तैयार नहीं था जाने को । २३ तारीख को जमकर बारिश हो गयी । रात भर पानी बरसता रहा । ये देखकर हमारी सासू माँ ने हाथ खड़े कर दिए । बोली की हम नहीं जायेंगे । अभी तक कुम्भ नहीं नहाया तो क्या आवश्यकता है की हम महाकुम्भ स्नान के लिए भयंकर भीड़ में जाये और परेशान हो । हम यही ठीक है । उन्हें हमने समझाते हुए कहा की आप चिंता मत करिए उपरवाला जो चाहेगा वो होगा । अगर जाना होगा तो वैसी सुविधाएँ मिल जाएगी और आप संगम स्नान कर के आ जाएगी. हमने अपने दिमाग से संगम स्नान का ख्याल ही निकाल दिया और दूसरे दिन सम्मान समारोह में शामिल होने के लिए चले गए सुबह से ही सूरज चमक रहा था । बादल -पानी का कही नामोनिशान नहीं था । तय हुआ की हम लोग तीन बजे तक कानपूर छोड़ देंगे । लेकिन सम्मान समारोह में ही पाँच बज गया । कानपूर तो वैसे ही कचरापुर है जगह- जगह कूड़ा -करकट वहा की शान है जिसमे इजाफा करते है चरते हुए सूअर । ऊपर से रात की बारिश ने सडको को बदबू से भर दिया था । इन सबसे बचने के लिए गाड़ी वहाँ के लिए सर्वोतम है क्योकि कानपूर में आवागमन के लिए ऑटो या टेम्पो ही ज्यादा चलते है जो की हर समय भरे रहते है। इस लिए सुबह से ही इनोवा गाड़ी भाड़े पर ले ली थी। सम्मान समारोह के दौरान विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष केशरीनाथ जी त्रिपाठी का आगमन हुआ था साहित्यकारों को सम्मानित करने के लिए । बातचीत के दौरान कुम्भ जाने की बात बताई तो उन्होंने सबसे पहला सवाल किया "कहा ठहरेंगी "? हमारे जवाब देने पर की होटल लें लेगे । इसपर उन्होंने कहा की इस समय आपको होटल कहा मिलेगा। उन के इस सवाल पर हम लोग सकते में आ गये। हम लोगो को असमंजस की स्थिति में देख कर पूछा कि -" आप लोग कितने लोग है ?" हमने जवाब दिया कि सात (७) लोग। इस पर आपने जवाब दिया की अलाहाबाद के लिए निकलने से पहले एक बार हमे फोन कीजियेगा, हम आप लोगो के रुकने की व्यवस्था करते है। हम लोगो ने निकलने से पहले उन्हें फोन लगाया तो त्रिपाठी जी ने बताया कि आपके ठहरने की व्यवस्था सिविल लायंस के एक होटल "स्टार रिजेंसी " में हो गयी है । ये सुनकर हम लोग खुश हो गए । अब यात्रा का मजा दुगुना हो गया क्योकि अब हम लोगों को होटल खोजने की जेहमत नहीं उठानी थी । लेकिन महाकुम्भ स्नान अभी भी एक युद्ध से कम नहीं था । होटल में पहुच कर सबने सुबह छह बजे निकलने की योजना बनायीं लेकिन रात्रि में देर तक जगे रहने के कारण सोकर उठे सुबह के आठ बजे ।
चाय पीकर हम लोग संगम के लिए निकल गए
जगह -जगह पुलिस वाले वर्दी-पेटी से लेस लोगो को अपना डंडा दिखा रहे थे । ग्रामीण लोग अपने बच्चों और सामान के संग दस किलोमीटर चल कर गंगा स्नान करने जा रहे थे
| बोट क्लब |
| पक्षियों का भी महाकुम्भ स्नान |
| अलाहाबाद का किला सुनते है की इस किले के नीचे से सरस्वती नदी निकली है |
| पवित्र स्नान कर उड़ते पक्षी |
| तट पर भारी भीड़ भीड़ के साथ ही पक्षी भी स्नान का आनंद उठाते हुए |
| आस्था और श्रद्धा का संगम महाकुम्भ स्नान |
| बोतल के हवाले गंगा जल |
| पवित्र डुबकी |
| श्रद्धालुओं की श्रद्धा को बोतल में बंद कर बोतलों को नाव में रखकर बेचता नाविक |
| आस्था का अर्पण |
| शहर का कचरा गंगा के हवाले . आस्था के ऊपर प्रहार |
ऊपर वाले की कृपा से हम लोगो को किसी भी प्रकार का कष्ट कुम्भ स्नान में नहीं उठाना पड़ा और हम सभी सकुशल स्नान कर मधुर यादों को समेटे अपने गंतव्य पर वापिस लौट गए।
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